टुसू पर्व क्यों मनाया जाता है? टुसू माता कौन है?
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झारखंड के कुर्मी और आदिवासी समाज में सुसु पर्व का खास महत्व होता है. यह पर्व कुंवारी कन्या मनाती हैं . टूशु का शाब्दिक अर्थ ही होता है कुंवारी. 15 दिसंबर को अगहन संक्रांति की स्थापना करके, 14 जनवरी को मकर सक्रांति के दिन टुसू पर्व मनाया जाता है .अगली सुबह tusu मनी को एक लकड़ी का बना हुआ चौखट जैसा आकृति जिसे चढल (chaudaal)कहते हैं ,पर बैठा कर नजदीक के जलाशय में विदाई दे दी जाती है. झारखंड में गांव में chaudal, (आधीरा) निर्माण करते समय खजूर, ताड़ के पत्ते का अधीरा तैयार किया जाता है. मकर के पूर्व रात्रि में अधीरा को जलाया जाता है. इसके आसपास माईक्सेट बजाकर युवा वर्ग फिल्मी गानों पर डांस भी करते हैं. सुबह अधीरा स्थल से ही नदी तालाब व जलाशय में मकर संक्रांति का स्नान हेतु डुबकी लगाते हैं. इसके पीछे एक कहानी है tusumani का जन्म उड़ीसा के मयूरभंज के एक कुर्मी परिवार में हुआ था. वह बहुत ही खूबसूरत दिखती थी .बंगाल का जब नवाब सिराजुद्दौला बना उसके सैनिकों ने क्षेत्र में अत्याचार शुरू कर दिया. इसी क्रम में सिराजुद्दौला के सैनिकों ने tusumani का अपहरण कर लिया लेकिन जब नवाब को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने सैनिकों को बहुत डांट डपट करके उसे वापस पहुंचाने को कहा. सैनिकों को सजा भी दिया .इसके बाद सैनिकों ने tusumani को सम्मान के साथ घर पहुंचा दिया लेकिन समाज ने उसकी पवित्रता पर उंगली उठाया . इसके कारण tusumani दुखी हो गई क्योंकि समाज ने उसे अपनाने से मना कर दिया था. इसी से दुखी होकर tusumani ने जल समाधि ले ली .उसी दिन मकर सक्रांति थी तब से कुर्मी, आदिवासी समाज बेटी के बलिदान की याद में टुसू पर्व बनाता है.
मकर सक्रांति में खिचड़ी क्यों बनाया जाता है? 14 जनवरी के बाद खिचड़ी बनाने की परंपरा का विकास कैसे हुआ?
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झारखंड में मकर सक्रांति के दिन लोग सुबह स्नान और पूजा के बाद तिल उड़द दाल चावल और चूड़ा का दान करते हैं. मान्यता यह है कि ऐसा करने से पाप कट जाता है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है. मकर सक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने की प्रथा बाबा गोरखनाथ के समय से शुरू हुई थी, जब अलाउद्दीन खिलजी ने झारखंड पर आक्रमण कर दिया था .तब नाथ योगी को युद्ध के दौरान भोजन बनाने में काफी दिक्कत होती थी .उन्हें भूखे ही लड़ाई करनी पड़ती थी. उस समय बाबा गोरखनाथ ने दाल चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी थी. यह जल्दी तैयार हो जाती थी पौष्टिक भी थी और शरीर के लिए अच्छा भी था. बाबा गोरखनाथ ने इसी व्यंजन का नाम खिचड़ी रख दिया .खिलजी को हराने के बाद मकर सक्रांति के दिन योगियों ने उत्सव मनाया और खिचड़ी का वितरण किया तब से मकर सक्रांति पर खिचड़ी बनाने की शुरुआत हो गई.