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झारखंड सरकार ने एक नया कानून बनाते हुए यह कहा है कि निजी क्षेत्र में ₹40000 तक की नौकरी स्थानीय युवाओं को मिलेगा .झारखंड के पहले यह कानून मध्य प्रदेश आंध्र प्रदेश हरियाणा कर्नाटक और तेलंगाना में बनाया गया है लेकिन वहां यह मामला हाई कोर्ट में चला गया है. कानून के जानकारों के मुताबिक यह सीधे तौर पर संविधान का अनुच्छेद 16 का दूसरा पैराग्राफ का उल्लंघन है. जिसके मुताबिक जन्म स्थान के आधार पर रोजगार पर प्रतिबंध लगा देना भारत के नागरिकों का, मूल अधिकार का हनन है और अगर इस प्रकार का कोई कानून बनाया भी जाता है तो संसद को इसका अधिकार है. इसलिए झारखंड में जो नया कानून बना है यह सीधे तौर पर कोर्ट में चला जाएगा .सुप्रीम कोर्ट ने 1984 में प्रदीप जैन के मामले में स्थानीय और माटी पुत्र की अवधारणा में यह कहा था की जन्म या भाषा के आधार पर कोई भी आरक्षण देना गलत है. संविधान के अनुसार भारत में केंद्रीय नागरिकता है इसी प्रकार का एक मामला 1995 में भी सुप्रीम कोर्ट में गया था जिसमें अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का सुप्रीम कोर्ट ने हनन बताया था. आंध्र प्रदेश मणिपुर त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में आरक्षण देने के लिए कुछ विशेष प्रावधान पहले से ही कर दिया गया है ,हालांकि झारखंड एक आदिवासी राज्य के रूप में जाना जाता है और लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.