रांची यूनिवर्सिटी में राज्य के बाहर की विद्यार्थियों को लिया जा रहा है इसे लेकर विवाद हो रहे हैं

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वैशाली jharkhand aajtak in

रांची विश्वविद्यालय में नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस प्रक्रिया में 97% अभ्यर्थियों का चयन राज्य से बाहर के लोगों में होने और स्थानीय आदिवासी-मूलवासी अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव के आरोपों के बीच एनएसयूआइ समेत विभिन्न संगठनों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया है। यूनिवर्सिटी राज्य द्वारा निर्मित नियमावली को न मानकर यूजीसी की नियमावली के तहत अनुबंध आधारित नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति राज्य के 8 विश्वविद्यालय में कर रही है। नियुक्ति प्रक्रिया में विवाद के मुख्य आरोप हैं कि
97% अभ्यर्थी बाहरी ,एनएसयूआइ के प्रदेश उपाध्यक्ष अमन अहमद ने आरोप लगाया कि रांची विश्वविद्यालय में यूजीसी की नियमावली के तहत हो रही नियुक्तियों में 97% अभ्यर्थी झारखंड के बाहर से हैं। इनमें से अधिकांश के दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया में शामिल किए गए, जबकि स्थानीय योग्य आदिवासी-मूलवासी उम्मीदवारों को नजरअंदाज किया गया ।
यूजीसी नियमावली का विवादित उपयोग यूजीसी ने राज्य सरकार और विश्वविद्यालयों को अपनी नियमावली बनाने की अनुमति दी थी, लेकिन झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा तैयार नियमावली को नजरअंदाज करते हुए यूजीसी के मानकों का पालन किया जा रहा है। इससे राज्य के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित सीटों पर भी बाहरी उम्मीदवारों को प्राथमिकता मिल रही है ।
JPSC के अध्यक्ष और सदस्यों के पद खाली होने के कारण सरकार को विश्वविद्यालयों के माध्यम से अनुबंध आधारित नियुक्तियां करनी पड़ रही हैं। एनएसयूआइ का दावा है कि इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और पक्षपात शामिल है ।

एनएसयूआइ के राज्य उपाध्यक्ष अमन अहमद ने कहा कि यह नियुक्ति झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा तैयार नियमावली के अनुसार ही हो अन्यथा नियुक्ति प्रक्रिया रद्द करने की मांग की। ताकि स्थानीय अभ्यर्थियों को नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक नियुक्ति में उचित अवसर मिल सके।इसके बाद, रांची विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अजीत कुमार सिन्हा का पुतला फूंककर विरोध दर्ज किया गया।
रांची यूनिवर्सिटी द्वारा नीड बेस्ड साक्षात्कार एवं नियुक्ति प्रक्रिया ये दर्शाती है कि उच्च न्यायालय झारखंड की आदेश की अहवेलना की जा रही है। एनएसयूआइ ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय इस आदेश को नजरअंदाज कर रहा है ।
विरोधियों का कहना है कि राज्य के आदिवासी और मूलवासी समुदायों को नौकरियों में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जो वर्तमान प्रक्रिया में संभव नहीं हो पा रहा है ।


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