झारखंड के सदान#सदान लोगों की विशेषताएं #सदान की उत्पत्ति एवं विकास#आभूषण#त्योहार#सदान और आदिवासी में विभिन्नता

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झारखंड के सदान

झारखंड में बसने वाले स्थानीय आर्य भाषी लोगों को सदन कहा जाता है।
किंतु सभी गैर जनजातियां सदन नहीं है सदन झारखंड की मूल गैर जनजातीय लोग हैं।
भाषा : खोरठा पंचपड़गानिया और कुरमाली भाषा को अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से हिंदू ही प्राचीन सदन है धर्म वालियों की मात्रिभाषा जैन, उर्दू, अरबी, फारसी नहीं होती है सदान द्रविड़ तथा आगरा तीनों वर्गो से संबंधित होते हैं।
सदान सामान्य तौर पर गैर जनजातीय है और झारखंड के मूल निवासी हैं।
अतः सदान शब्द का शाब्दिक अर्थ होगा- “ऐसे लोग जो यहां बसे हुए थे”

सदान लोगों की विशेषताएं :
• यह समुदाय होते है।
• यह संभवत घुमंतू नहीं होते हैं। और यह स्थान उद्देश्य परिवर्तित करते हैं।
• कई सदान जो स्वयं को आदिवासी नहीं कहते फिर भी जनजाति के रूप में अनुसूचित है।
भाषा की दृष्टि से सदानी वे है जो खोरठा, नागपुरी, पंच-परगनिया और कुरमाली है।

धर्म की दृष्टि से प्राचीन हिंदू सदान है। इस्लाम का उद्भव छठ वी सदी में हुआ। किंतु झारखंड में आगमन 16 वी ईस्वी में हुआ। इसके पूर्व जैन धर्मावलंबी भी सदानी थे। इसकी पुष्टि इससे होती है कि इन धर्मावलंबियों की मातृभाषा जैनी, उर्दू या अरबी ना होकर खोरठा, नागपुरी, पंचगनी कुरमाली आदि है इससे इनकी सदानी होने का प्रमाण मिलता है।

प्रजातीय दृष्टि से सदानी लोग आर्य हैं। यद्यपि कुछ द्रविणं वंशी भी सदानी है। जाति की दृष्टि से सदानी को कई भागों में बांटा जाता है।

  1. वैसी जातियां है जो देश के अन्य हिस्सों में भी है तथा झारखंड में भी है।जैसे- ब्राह्मण, राजपूत, टेली, माली, कुम्हार, कुर्मी, सुनार, कोइरी, अहीर (यादव), बनिया, डोम, चमार, दुसाध, ठाकुर और नाग जाति इत्यादि।
  2. वैसे जातियां जो केवल छोटानागपुर में ही मिलती है। जैसे-बड़ाईक, देशावली, पाईक, धानुक, राउतिया, गोराई, घासी, भुइयां, पान, प्रमाणिक, ताती, खासी, कोस्टा, जोड़ा, रक्सौल, गोसाई, बरगाहा, भाट, भंवरी, कांदु लोहरिया, खंडप, सराक, और मलार इत्यादि।
  3. कई सदन जातियां जिनका गोत्र अवधिया, कनौजिया, तिरहुतिया, गॉड , पुखिया, है यहां की ना होकर झारखंड से बाहर का है।

इस प्रकार झारखंड में दो परिवार दिखाई देती है, एक आदिवासी व दूसरा सदन। दोनों की सांस्कृतिक संरचना विपरीत है। परंतु दोनों परिवारों ने एक दूसरे के सांस्कृतिक तत्व को ग्रहण कर लिया है। जैसे आदिवासी परिवार कुछ सनातनी, जन्म मृत्यु को वैदिक रुप से संपन्न करते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ सदानी परिवार आदिवासी संस्कार को अपनाए हुए हैं। जैसे वधू मूल्य देना, पूजा पाठ सरना में करना, मुर्गा की बलि चढ़ाना इत्यादि।

सदान की उत्पत्ति एवं विकास :
• सदन जाति के संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अनुसंधान डॉ बी पी केशरी ने किया है। इनके अनुसार सदन शब्द की उत्पत्ति सत्य, सत, सदमा शब्दों से हुई है। जिसका अर्थ है – जो लोग घर में रहते हैं, जीवन के प्रति पवित्र दृष्टिकोण रखते हैं आदि।

•आग्नेय भाषा परिवार में सदान ‘सदोम’ सबसे मिला है- जिसका अर्थ घोड़ा होता है।

• सदानी समाज के अंतर्गत 4 भाषा समूह आते हैं – नागपुरी, पंचपड़गानिया, खोरठा और कुरमाली।

• वास्तव में सदारीकरण एक नियमित चलने वाली प्रक्रिया है। झारखंड में पहले आर्यों का प्रवेश फिर मुंडा, उड़ाओ जैसी बाहरी जनजातियों का आगमन एवं तेरहवीं सदी में मुसलमानों का प्रवेश और इन सब जातियों द्वारा स्थानीय सभ्यता संस्कृति को अपनाना सदानीकरण की प्रक्रिया का ही हिस्सा है।

• धार्मिक दृष्टिकोण से सदन जैन, बौद्ध, वैष्णव धर्म, के उपासक है एवं आर्य रीति परंपरा के साथ-साथ आदिवासी परंपरा से भी जुड़े हुए हैं। पूजा अर्चना उपवास यज्ञ देवताओं का पूजन इनकी परंपरा का अंग है।

• शारीरिक या प्रजाति के दृष्टिकोण से सदन आर्य द्रविड़ और आस्तिक तीनों समूह से जुड़े हुए हैं तथा इनका रंग गोरा, काला, साबला सभी प्रकार का है।

• सामाजिक दृष्टिकोण से सदनों की विवाह पद्धति संस्कार वस्त्र परिधान आर्यों से मिलते जुलते हैं। जैसे धोती, कुर्ता, गमछा इनका पारंपरिक पोशाक है तथा महिलाओं में आभूषण के प्रति आकर्षण है। सदानी महिला पोल शाखा, हार, बिछिया, हंसली, सीकरी, नथिया, मांग टीका जैसे आभूषण पहनती है। सदानो का समाज पितृसत्तात्मक होते हैं तथा मातृ कुल में वैवाहिक संबंध वर्जित होता है।

• आर्थिक दृष्टिकोण से सदनों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। फिर भी कृषि कार्य तांबे एवं पीतल के बर्तन निर्माण, पशुपालन, मत्स्य पालन, इनका प्रमुख पेश रहा है।

• सांस्कृतिक दृष्टिकोण से सदनों और आदिवासियों की संस्कृति आपस में घुली मिली हुई है। सदन होली, दिवाली, दशहरा, ईद, बकरीद के साथ-साथ जितिया, सरहुल , सोहराय कर्मा, तूसु, भी मिलजुल कर मनाते हैं। विवाह एवं खुशी के अवसर पर महिलाएं दमकच, झूमर, सोहर, फगुआ जैसे गीत एवं नृत्य करती है।

आभूषण :
सदनों में बंगाल में पहने जाने वाले आभूषण खूब प्रचलित है।
पुणे आदिवासियों की प्रचलित आभूषण भी सदनों में प्रचलित है। जैसे शंख कंगन, बिछिया, सीकरी, बुलाकी, नथिया ,कर्णफूल मांग टीका, पटवासी इत्यादि पुनः सदनों में आदिवासियों की तरह गोदना का भी प्रचलन है।
सदान लोग घरेलू प्रयोग के रूप में चटाई, मचिया, लेदरा, धड़का, पेटी, टंगना, माचा इत्यादि वस्तुएं है।

मुसलमान परिवारों में नेरूआ लोटा और बधना अवश्य होता है।
सदन समाज पितृ सात्मक है। पिता के बड़े भाई के बड़का बाबू जी, माता की बहन मौसी, पिता का छोटा भाई काका, पिता के पिता दादा या बाबा और पिता की मां दादी या गमा कहलाती है।
बहन के पति बहनोई, बड़े भाई की पत्नी भौजी, पति के छोटे भाई देवर, पत्नी की छोटी बहन साली, बड़ी बहन जेठ सास कहलाती है।

त्योहार :
सदान लोग जो पर्व त्यौहार मनाते हैं वह ज्ञान सदनों को भी आकर्षित करता है। सदानो में पर्व त्यौहार का बड़ा महत्व है। सदनों में कई पर्व त्यौहार ऐसे हैं जो आदिवासियों के भी है।सदानो की प्रमुख पर्व होली, दिवाली, दशहरा, काली पूजा, जितिया, सोहराय, कर्मा, सरहुल, मकर सक्रांति,इत्यादि है ।
मुसलमान सदनों में ईद, मुहर्रम प्रमुख है।

नृत्य संगीत :
कर्म पर में लड़कियों का सामूहिक नृत्य अखरा में होता है। आदिवासियों की तरह सदान कि गांव में भी होता है। सदानो की गांव की पहचान अखरा से होती है। डमकच, झुमटा, झूमर इत्यादि सामूहिक नृत्य है जो आम महिलाओं घर आंगन याअखरा में करती है।

सदान के गीत कई प्रकार के होते हैं और गीत का भी नृत्य के आधार पर या त्योहार के आधार पर नामकरण हुआ है। जैसे डमकच, फगुआ सोहराई उदासी इत्यादि।
एक गांव में एक से अधिकअखरा हो सकता है।

सदान और आदिवासी में विभिन्नता

झारखंड में सदानो और आदिवासियों की संस्कृति और परंपरा मिश्रीत है किंतु दोनो में कुछ विभिन्नता भी पाई जाती है:

1) सदान गैर-जनजातीय मूल निवासी है जबकि आदिवासी जनजातीय मूल निवासी है।

2) सदान स्थायी जीवन जीते है जबकी आदिवासियों में घुमंतू जीवन की परंपरा भी पाई जाती है।

3) झारखंड के सदान को जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया है। जबकि किसी आदिवासी को सदान के रूप में अधिसूचित नही किया गया है। झारखंड में 7 सदानो को जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया है जो बिरजिया, चिक बड़ाइक, माहली, किसान, करमाली, लोहारा और गौडाइत है। इसके अलावा झारखंड में अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित 5 जनजाति अपने आप को आदिवासी नही मानते बल्कि वो अपने को राजपुत मानते है।

4) सदान सामुदायिक जीवन जीता है, जबकि आदिवासी का जीवन स्वरूप कबीलाई है।

5) आर्थिक दृष्टिकोण से सदान की स्थिति आदिबसियो से अच्छी है।


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