छठी मैया कौन हैं, जानिए. भगवान सूर्य की पूजा क्यों होती है? महाभारत में द्रोपदी ने भी किया था छठ पर्व.

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Vks jharkhand aaj tak news छठ महापर्व को कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन के नाम से जाना जाता है। इस महा पर्व में छठी मैय्या की पूजा की जाती है लेकिन साथ में भगवान सूर्यदेव का अर्घ्य दिया जाता है।ऐसे में बहुत कम लोगों यह जानते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है। तो चलिए आपको यहां बताते हैं कि छठ पूजा में छठी मैय्या के साथ-साथ सूर्यदेव की आराधना क्यों की जाती है और छठ के दौरान सूर्यदेव को अर्घ्य क्यों दिया जाता है। साथ में यह भी जानते हैं कि छठ मैय्या कौन हैं…

कौन हैं छठ मैय्या ?

हिन्दू धर्मग्रंथों में छठी मैय्या के बारे में विस्तृत वर्णन है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, सृष्टि की रचना करने वाली देवी प्रकृति ने अपने आप को छ(6) भागों में बांटा था। प्रकृति देवी का छठा भाग सबसे महत्वपूर्ण माना गया है और मां के छठे स्वरूप को ही सर्वश्रेष्ठ मातृदेवी के रूप में जाना जाता है, जो कि भगवान ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं। मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि देवी मां के इस छठे अंश को ही छठी मैय्या के नाम से आगे जाना गया है।

छठ पर सूर्यदेव की क्यों होती है पूजा?

हिन्दू शास्त्रों के मुताबिक और ऐसी मान्यता है कि छठी मैय्या को सूर्यदेव की बहन माना जाता है। इस वजह से छठ के इस पर्व पर सूर्यदेव की भी पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि नवजात बच्चे के जन्म के 6 महीने तक छठी मैय्या उनके पास रहती हैं और बच्चों की रक्षा करती हैं। इसलिए छठी मैय्या के साथ सूर्य को अर्घ्य देकर लोग सूर्यदेव से अपने परिवार और बच्चों की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

छठ पूजा में व्रती सूर्य देव से अपनी संतान और परिवार के लिए सुख-समृद्धि और निरोगी जीवन की कामना करते हैं। छठ पूजा के बारे में विभिन्न महापुराणों में सीमित रूप से बताया गया है, लेकिन माना जाता है कि यह उप-पुराण साम्व पुराण में इसके बारे में विस्तृत व्याख्या की गई है। इस पर्व के रीति-रिवाजों से मिलते-जुलते अनुष्ठान ऋग्वेद में सूर्य-पूजा के मन्त्रों में मिलते हैं।

छठ पर्व से जुड़ी कथाएं और कहानी

छठ पर्व की जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में सूर्यवंशी राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी नि:संतान थे। राजा ने संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप के निर्देशानुसार एक यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के परिणामस्वरूप रानी मालिनी गर्भवती हुईं, लेकिन उन्होंने मृत शिशु को जन्म दिया। इससे राजा इतने दुखी हो गए कि उन्होंने आत्महत्या करने का निर्णय ले लिया। संयोग से तभी देवी षष्ठी प्रकट हुईं, जिन्हें छठी मैया के नाम से भी जाना जाता है।

देवी ने राजा से कहा कि यदि वह उनकी सच्चे मन से पूजा करेंगे और श्रद्धा के साथ व्रत करेंगे, तो उन्हें संतान अवश्य प्राप्त होगी। देवी की आज्ञा का पालन करते हुए राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी ने पूरी श्रद्धा से छठ व्रत रखा। इसके परिणामस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। जिसके बाद दोनों पति-पत्नी खुशी-खुशी रहने लगे।

छठ पर्व को लेकर एक और कथा प्रचलित है। जब पांडव अपना सारा राजपाट हार गए थे तब भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को छठ व्रत करने को कहा था। द्रौपदी ने छठ का व्रत किया और उनकी मनोकामना पूरी हुई और पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया।


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