वित्तीय स्थिरता व भारत में बैंकों की स्वायत्तता

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वित्तीय स्थिरता क्या है? क्या भारत में बैंकों को और स्वायत्तता देना चाहिए?

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भारत में वित्तीय स्थिरता जरूरी है और बैंकों को भी स्वायत्ता देनी पड़ेगी लेकिन हाल में ही यह चर्चा में क्यों है- रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल की पुस्तक ओवरड्राफ्ट में भारतीय बचत खाता में जमा रुपए का भविष्य क्या है ,इसे लेकर विश्लेषण किया गया है।
क्वेस्ट फॉर रीस्टोरिंग फाइनेंशियल स्टेबिलिटी इन इंडिया पुस्तक विरल आचार्य की है इसमें भी भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पर नजर डाली गई है।
आर्थिक व्यवस्था में अगर अत्यधिक मौद्रिक और ऋण प्रोत्साहन दिया जाए तो इससे वित्तीय स्थिरता खतरे में आ सकती है। जैसा कि हम जानते हैं एनपीए बैंकों की बहुत बड़ी असफलता है और जितना ज्यादा एनपीए बढ़ेगा उतना ज्यादा बैंकों की बैलेंस शीट खराब होगी और बैंकों के पास अतिरिक्त पूंजी कम हो जाएगी ऐसे में नए उधार कर्ता और नई परियोजना को नया रेंज अगर दे दिया जाता है तो बैंकों की पूरी क्षमता ही प्रभावित हो जाएगी बैंकों के ऋण के छोटे हिस्से से ही लाभ कमाना पड़ेगा क्योंकि उसका अधिकांश पैसा बाजार में गैर निष्पादित संपत्ति के रूप में , यही कारण है कि वित्तीय स्थिरता का जिक्र रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया करती हैvinayiasacademy.com आर्थिक मंदी और कोरोणा संकट से जूझ रहा बैंकिंग व्यवस्था में लगभग ₹400000 का कर्ज वापस नहीं होगा तो बैंकिंग व्यवस्था भारत में चरमरा जाएगी जितना ज्यादा किसी बैंक का एनपीए बढ़ेगा बैंकों को पुनर्जीवन के लिए एक पूंजी की जरूरत होगी जीएसटी के संग्रहण से और आयकर से राजस्व में भारी गिरावट हो चुका है ।राष्ट्रीय आय भी इस समय संकट में है ऐसे में लंबित भुगतान ,मंजूरी गरीब परिवार को नगद भुगतान जैसे कई व्यवस्था राज्य के ऊपर छोड़ दिया गया
अब सवाल यह उठता है कि अगर बैंकों को निर्णय लेने की आजादी नहीं होगी उसके हाथ बंधे रहेंगे तो व अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप अपने आप को तैयार नहीं कर पाएगी तथा जिस प्रकार से अमेरिका में 1990 के दशक में बैंक डूबने लगे थे उसी प्रकार की स्थिति भारत में विकसित हो जाएगी इसलिए जरूरी है कि बैंकों को और अधिक स्वायत्त बनाया जाए
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