नागरिकता संशोधन कानून (कैब)को उच्च न्यायालय चुनौती दी गई है याचिका में कहा गया है कि यह कानून धार्मिक आधार पर नागरिकता देता है जो संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 के विरुद्ध है यह तो अधिकार संविधान के बुनियादी ढांचे के हिस्से हैं जिन्हें तोड़ा नहीं जा सकता विशेषज्ञों के अनुसार कानून को अदालत में तार्किक वर्गीकरण के परीक्षण से गुजरना होगा.

संसद में अमित शाह ने कहा की कानून अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) एवं अनुच्छेद 15 (लिंग ,जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर भेदभाव से बचाव का अधिकार) के विरुद्ध नहीं है वरिष्ठ वकील ने बताया कि यह सिद्धांत को वर्ष 1951 में स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल का नाम अनवर अली सरकार केस में इजाद किया गया था

दरअसल डकैती के दौरान हरीश नागरिकों की मौत हो गई थी जिसे देखते हुए बंगाल सरकार ने इस केस को विशेष अदालत में चलाने का आदेश दिया। इस आदेश ने उच्चतम न्यायालय को चुनौती दी उसने कहा कि यह उसके साथ भेदभाव है कि डकैती की अन्य केस जिसमे किसी अंग्रेज की मृत्यु नहीं हुई है

अभी सामान्य अदालतों में चल रहे हैं लेकिन अदालत ने इसे अनुच्छेद 14 के तहत एनिमल क्लासिफिकेशन माना और उसकी याचिका खारिज कर दी । बता दे कि नागरिकता संशोधन कानून को भी परीक्षण का सामना करना पड़ सकता है।