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भारत में क्षेत्रीय पार्टी के भविष्य पर चर्चा करें और क्या भारत को अब सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी की ही आवश्यकता है?
भारतीय लोकतंत्र में अब एक नई सच्चाई सामने आ रही है जिसमें जातीय समीकरण व भाषाई गौरव पर आधारित है। शक्तिशाली क्षेत्रीय दल बिखर रहे हैं, पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र और तमिलनाडु से लेकर जम्मू-कश्मीर तक यह देखने को मिल रहा है। तमिलनाडु में द्रविड़ दल कभी क्षेत्रीय पहचान भाषा, गौरव और सामाजिक न्याय के मजबूत स्तंभ हैं जो उत्तरी संस्कृति के वर्चस्व के विरुद्ध खड़े थे लेकिन वैचारिक ऊर्जा का कमज़ोर पड़ जाना, नेतृत्व परिवर्तन होना, संगठन का कमजोर पड़ना और अपने मूल आकर्षण और मुद्दे को छोड़ देना महत्वपूर्ण कारण बना है, जिससे राष्ट्रीय दल की महत्व बढ़ी है। जो विधायक चुनकर आते हैं वे नए राजनीतिक मंच की ओर जाते हैं जो बदलते राष्ट्रीय प्रदेश में अधिक प्रासंगिक का वादा कर रहे हैं।
इससे पता चलता है कि राष्ट्रीय सत्ता प्रतिष्ठान के साथ जुड़ाव कमजोर, विरासत के प्रति निष्ठा से अधिक लाभ हो रहा है।
भ्रष्टाचार विरोधी और सुशासन आधारित विचारधारा के साथ पार्टी सत्ता में तो आती है, लेकिन वह शीघ्र बिखर जाती है क्योंकि क्षेत्रीय रूप से लोग के बीच तुरन्त ही यह मैसेज चला जाता है कि पार्टी भ्रष्टाचार में शामिल है, इसलिए कल्याणकारी योजना और व्यवस्था के साथ टकराव की राजनीति भी शुरू हो गई है, यानी केंद्र और राज्य में अगर एक ही पार्टी की सरकार होती है तो इसे आगे बढ़ाया जाता है। एक प्रभावशाली व्यक्तित्व को आक्रामक राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजना की स्पष्ट वैचारिक योजना के साथ जोड़कर अब देखा जा रहा है, संवाद करना, लक्षित योजना और संस्थागत प्रभाव के माध्यम से मतदाता के साथ ऐसा संबंध स्थापित करना जो पारंपरिक दलगत मध्यस्थ को दरकिनार कर दिया है। भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा यह होगी कि क्या यह राजनैतिक केन्द्रीकरण, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और संस्थागत संतुलन को बनाए रखता है या केवल अनेक छोटे सत्ता केंद्र की जगह एक बड़े सत्ता केंद्र को स्थापित कर देता है, यह भी स्पष्ट होगा कि यह पुनर्गठन अधिक संगठित और प्रभावी लोकतंत्र का निर्माण करता है या केवल कुछ सत्ता के हाथ में केंद्रित रहता है।