*अनोखा गांव- बापूजी का दांडी, जहां 50 वर्षों में पंचायत चुनाव की नौबत ही नहीं आई सर्वसम्मति से ही होता है निर्णय
Nitusingh abtaknews.live
पंचायत चुनाव को लेकर भारत के अलग-अलग राज्य में कार्यक्रम चल रहा है .पंचायत चुनाव को लेकर हिंसा भी जारी है .लाखों करोड़ों रुपया मुखिया और सरपंच प्रत्याशी के द्वारा खर्च भी किया जा रहा है. ऐसे समय में गुजरात के दांडी गांव को समझना जरूरत है .यहां पर अभी तक चुनाव की व्यवस्था तो है लेकिन चुनाव नहीं होती है क्योंकि यहां के सभी लोग मिल बैठकर फैसला कर लेते हैं कि किसे सरपंच और मुखिया बनाना है .दांडी गांव की आबादी 1130 है इसमें कई नॉनरेजिडेंट इंडियन भी है ,यानी कि यहां मुखिया सहित तमाम सदस्य का मनोनयन होता है .फैसला ग्रामीण सभी की सहमति से कर लेते हैं, इसलिए गुजरात में समरस पंचायत अर्थात बिना चुनाव के सहमति से सरपंच सदस्य के चुनाव की पहल शुरू हो गई है. पहल तब शुरू हुई जब नरेंद्र मोदी जी यहां के मुख्यमंत्री थे. उस समय युवक मंडल संभालते थे गांव की पूरी व्यवस्था ग्रामीणों में आम सहमति बनाने के लिए कई बैठक होती है. इस बैठक में गांव की समस्या की ओर जो सबसे ज्यादा ध्यान देता है और पूरा वर्ष काम करता है, उसे ही मुखिया और सरपंच के रूप मनोनयन कर दिया जाता है. 1972 ईस्वी से यही व्यवस्था यहां पर लागू है .दांडी में पहले युवक मंडल संस्था के नाम से काम करते थे. जो अब पंचायती राज व्यवस्था के रूप में काम किया जा रहा है. इससे भारत के अलग-अलग प्रदेशों में भी सीखने की जरूरत है जहां पर हिंसा पंचायत चुनाव में हावी होती जा रही है.