देश का पहला “ टायर पार्क” पश्चिम बंगाल में स्थापित # जाने विस्तार से

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देश का पहला “ टायर पार्क” पश्चिम बंगाल में स्थापित किया जाएगा।

भारत का पहला टायर पार्क बनाने की योजना बनाई गई पश्चिम बंगाल में,जहाँ बेकार हो चुके टायरों और उसके खराब हिस्सों से बनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई जाएगी।यह एक अधिकारी द्वारा अद्भुत अवधारणा बताया गया जिसके अनुसार यह पहला ऐसा पार्क है जो अब तक देश में कहीं भी नहीं है।इस पार्क का निर्माण करने का मुख्य उद्देश्य यही है कि कचरे को उपयोग में लाया जा सके और इसके साथ ही कचरे को किस तरह कला में तब्दील किया जा सकता है। जिससे लोग प्रभावित हो सके। किसी भी सामान को रद्दी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि कचरे का भी उपयोग बहुत सी वस्तुएँ बनाने में लगता है और यही कचरा काम में लाया जा सकता है और यह बात राजनवीर कपूर जो कि पश्चिम बंगाल परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक हैं ,उनका भी यही मानना है कि कचरे को दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है और इसे कला का रूप दिया जा सकता है।यह टायर पार्क की शुरुआत जल्द ही पश्चिम बंगाल परिवहन निगम परिवहन के द्वारा की जाएगी।उनके अनुसार टायरों पर दोबारा काम किया गया है जो कई बस डिपो मे उपयोग किए जा चुके हैं और उन्हीं टायरों को हटाकर प्रयोग में लाया गया है। इन्हीं टायरों को डब्ल्यूटीसी की टीम द्वारा रंग बिरंगे आकार में बदला गया है। यह टायर पार्क एस्पलानेड क्षेत्र में खुलेगा जहाँ एक छोटा कैफे भी होगा,जहाँ लोग बैठ कर आराम कर सकते हैं,और टायर से बनी कलाकृतियों को देखकर अपने मन को आनंदित कर सकते हैं।जल्द ही इस पार्क के शुभारंभ की तारीख की घोषणा की जाएगी।

जाने पश्चिम बंगाल के बारे में
पश्चिम बंगाल भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक राज्य है।इसके पड़ोस में नेपाल, सिक्किम, भूटान, असम,बांग्लादेश,ओडिशा,झारखंड और बिहार है। इसकी राजधानी कोलकाता है । इसका मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी है।और राज्यपाल जगदीप धंखर है। पश्चिम बंगाल का उच्च न्यायालय को कलकत्ता उच्च न्यायालय कहा जाता है जो कोलकाता में ही है, इसकी स्थापना (1862) में हुई ,और इसका एक ब्रांच भी है जिसे खंडपीठ कहा जाता है वो पोर्ट ब्लेयर में है कलकत्ता उच्च न्यायालय के अंतर्गत पश्चिम बंगाल, अंडमान एवं निकोबार दीप समूह आता है। वर्तमान में कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टीबीएन राधाकृष्णन है।पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीट और विधान सभा मे 294 सीट है।इसके राज्य में 23 जिले हैं यहाँ के मुख्य भाषाएँ बांग्ला है।इसकी स्थापना 26 जनवरी 1950 में हुई इसका सबसे बड़ा शहर कोलकाता है ।इसके राज्यपाल जगदीप धनगढ़ है।यह चितरंजन रेल कारखाना के लिए प्रसिद्ध है। रेलवे के चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स में तैयार किया गया यह इंजन 24 कोच की ट्रेन को 160 किलोमीटर की रफ्तार से पटरी पर दौड़ा सकता है और वर्तमान समय में यह रफ्तार अधिकतम 140 किलोमीटर प्रति घंटे की होती है।यह इंजन पूर्व रूप से मेक इन इंडिया के मॉडल पर आधारित है,जिसका डिजाइन और डेवलपमेंट सब कुछ चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स ने किया इसकी इंजन की रफ्तार को बढ़ाने के लिए इंजीनियरों ने इसका वजन 14 टन तक कम किया है,साथ ही इसके गियर मे भी बदलाव किये गए है।रेलवे द्वारा इस इंजन का इस्तेमाल राजधानी, शताब्दी और दुरंतो जैसे ट्रेनों में करेगा।


भारतीय रेल दिल्ली से मुंबई और दिल्ली से कोलकाता के बीच ट्रेनें को 160 किलोमीटर की रफ्तार से चलाने पर तेजी से कार्य कर रहा है। रेलवे को इसके लिए केंद्र सरकार ने करीब तेरह हजार करोड़ रूपये भी मंजूर किए हैं। ऐसे में मेक इन इंडिया इंजन रेलवे सेमी हाई स्पीड ट्रेन चलाने में मदद करती है। इसके साथ ही रानीगंज कोयला क्षेत्र पश्चिम बंगाल में स्थित है भारत में इस क्षेत्र में सबसे पहले कोयले का खनन 1774 ईस्वी में शुरू हुआ था। भारत में कोयले के खनन का इतिहास बहुत पुराना है ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1774 में दामोदर नदी के पश्चिमी किनारे पर रानीगंज में कोयले का वाणिज्य खनन की शुरुआत की। इसके बाद लगभग एक शताब्दी तक खनन का कार्य अपेक्षाकृत धीमी गति से चलता रहा ,क्योंकि कोयले की माँग बहुत कम थी। लेकिन 1853 में भाप से चलने वाली गाड़ियों के आरंभ होने से कोयले की माँग बढ़ गई और खनन को प्रोत्साहन मिला। इसके बाद कोयले का उत्पादन लगभग 1 मिलीयन मेट्रिक टन प्रति वर्ष हो गया। 19वीं शताब्दी के अंत तक भारत में उत्पादन 6.12 मिलीयन टन वार्षिक हो गया और 1920 तक 18 मिलीयन मेट्रिक टन वार्षिक हो गया। प्रथम विश्व युद्ध के वक्त उत्पादन में वृद्धि हुई , लेकिन 1930 के शुरुआती दशक में फिर से उत्पादन में कमी आ गई।1942 तक उत्पादन 29 मिलीयन मेट्रिक टन प्रतिवर्ष और 1946 तक 30 मिलीयन मेट्रिक टन हो गया। भारत में विश्व का 4.7 प्रतिशत कोयले का उत्पादन है।
पश्चिम बंगाल स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी खड़कपुर ( आईआईटी खड़कपुर) की स्थापना हिजली बंदी गृह के पास 1950 में हुई ।जब यहाँ पहले सत्र की शुरुआत हुई थी तब 42 शिक्षक और 224 छात्र थे। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1952 में कॉलेज की नई बिल्डिंग की नीव का पत्थर रखा। इससे पहले यह कॉलेज हिजली डिटेंशन कैंप में चलाया जाता था। इंडिया टुडे -नीलसन बेस्ट कॉलेज सर्वे 2016 में भारत के बेस्ट इंजीनियरिंग कॉलेज में आईआईटी खड़कपुर को दूसरा स्थान दिया गया है। यह उन पहले आईआईटी में से है जिनकी स्थापना सरकार ने सबसे पहले की थी। कैंपस की स्थापना खड़कपुर के कुख्यात हिजली बंदी गृह के पास की गई। एशिया में इसकी सबसे बड़ी साइंस और टेक्नोलॉजी लाइब्रेरी है, जिसमें 3.8 लाख दस्तावेज,1,250 प्रिंट जर्नल्स और 40,000 इबुक्स हैं।
पश्चिम बंगाल का विशेष स्थान है ,भारत के प्रागैतिहासिक काल के इतिहास में। बंगाल में गंगारिदयी नाम का साम्राज्य था सिकंदर के आक्रमण के समय में। गुप्त तथा मौर्य सम्राटों का
बंगाल पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। बाद में शशांक बंगाल नरेश बना। माना जाता है कि उसने सातवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में उत्तर पूर्वी भारत मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उनके बाद गोपाल ने सत्ता संभाली और पाल राजवंश की स्थापना की। पालो द्वारा विशाल साम्राज्य खड़ा किया गया। और चार शताब्दियों तक राज्य किया। पाल राजाओं के बाद बंगाल पर सेन राजवंश का अधिकार हुआ, जिसे दिल्ली के मुस्लिम शासकों ने हराया। मुगलकाल की शुरुआत से पहले पश्चिम बंगाल पर कई मुसलमान राजाओं और सुल्तानों ने शासन किया। उनके बाद आधुनिक बंगाल का इतिहास यूरोपीय तथा अंग्रेजी व्यापारिक कंपनियों के आने से आरंभ होता है। वर्ष 1757 मे पलासी के युद्ध ने वहाँ की इतिहास को मोड़ दिया जब अंग्रेजों ने सबसे पहले बंगाल और भारत में अपने पाँव जमाए। वर्ष 1905 में राजनीतिक लाभ के लिए अंग्रेजों ने बंगाल को बाँट दिया।लेकिन कांग्रेस के देखरेख में लोगों के बढ़ते हुए गुस्से को देखते हुए वर्ष 1911 मे बंगाल को फिर से एक कर दिया गया। इस स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए लोगों में और तेजी से भड़क और ज्वाला उठी जिसका पटाक्षेप 1947 में देश की आजादी और उसकी विभाजित करने के साथ हुई 1947 के बाद रियासतों के विलय का काम शुरू हुआ और राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 की सिफारिशों के अनुसार पड़ोसी राज्यो कि कुछ बांग्लाभाषी क्षेत्रों को भी पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया।इसके राज्य के पूर्व में बांग्लादेश, पश्चिम में नेपाल, उत्तर पूर्व में भूटान, उत्तर में सिक्किम पश्चिम में बिहार, झारखंड ,दक्षिण- पश्चिम में ओडिशा तथा दक्षिण में बंगाल की खाड़ी है।
इसके साथ ही वहाँ बैरकपुर से मंगल पांडे ने विद्रोह किया था, जिनकी कथा इतिहास में आज भी वर्णित है, उनके इस बलिदान को देश आज भी याद करता है। मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई ,1827 को संयुक्त प्रांत के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था।इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे तथा माता का नाम अभय रानी था। ब्राह्मण कुल में जन्मे मंगल पांडे को जीवन जीने के लिए अंग्रेजों की फौज में भर्ती होना पड़ा और इसी वजह से वर्ष 1849 में मात्र 22 साल की उम्र में मंगल पांडे ब्रिटिश इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए थे।उस वक्त जब ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचार से भारत परेशान था,भारतीयों के अंदर दबी जुबान से अंग्रेजो के खिलाफ विरोध के बिगुल फ़ूट चुके थे ,लेकिन यह आक्रोश तब टूटा जब कंपनी की सेना की बंगाल इकाई में एनफील्ड पी.53 राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ। इन कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था और भारतीय सैनिकों के बीच ऐसी खबर फैल गए कि इन कारतूसों को बनाने में गाय और सुअर की चर्बी का उपयोग किया गया है।और यही बात हिंदुओं के मन में बैठ गई कि अंग्रेज हिंदुस्तानियों का धर्म भ्रष्ट करने पर उतारू है। 9 फरवरी 1857 को जब नया कारतूस देशी पैदल सेना को बाँटा गया तब मंगल पांडे ने उसे लेने से मना कर दिया। इसी वजह से अंग्रेजों ने उनके हथियार छीन लिए जाने और वर्दी उतार लेने का आदेश दिया गया।और मंगल पांडे ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया।29 मार्च सन 1857 को उनकी राइफल छीनने के लिए जब अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन आगे बढ़े तो मंगल ने उन पर आक्रमण कर दिया।उसे मारने के बाद मंगल ने एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बॉब को भी मार डाला लेकिन इसके बाद मंगल को अंग्रेज सिपाहियों ने पकड़ लिया। फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फाँसी की सजा दी जानी थी,पर ब्रिटिश सरकार ने मंगल पांडे को निर्धारित तिथि से दस दिन पहले ही 8 अप्रैल सन 1857 को फाँसी पर लटका दिया।उनकी मौत ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा दिया था।उनकी फाँसी के ठीक एक महीने बाद ही 10 मई सन 1857 को मेरठ की सैनिक छावनी में भी बगावत हो गई और यह विद्रोह देखते देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया, हालांकि इस संग्राम को अंग्रेजों ने दबा दिया, लेकिन वो भारतीयों के अंदर उनके खिलाफ भरी नफरत को खत्म तो नहीं कर पाए और आगे जाकर उन्हें भारत को छोड़ना ही पड़ा।
कृषि के मामले में इस राज्य की आमदनी कृषि से ही होती है, और राज्य के हर चार में से तीन व्यक्ति मुख्य रूप से कृषि के कार्य में लगे रहते हैं। बंगाल में 2018 से 19 में सब्जी उत्पादन में देश में सबसे आगे रहा है।केंद्र सरकार की ओर से हाल में जारी बागवानी उत्पादन आंकड़ों से यह जानकारी प्राप्त हुआ है राज्यवार बागवानी उत्पादन के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2018-19 में पश्चिम बंगाल में सब्जियों का उत्पादन 2.95 करोड़ टन रहा है।और उस वर्ष के दौरान देश में किसी राज्य में सबसे अधिक सब्जी उत्पादन वाला राज्य रहा है।इसका श्रेय हमारे किसानों को जाता है।उन्होंने कई खाद्य का उत्पादन किया जिसमें वर्ष 2006-07 में राज्य के कुल खाद्य उत्पादन पंद्रह हजार आठ सौ बीस हजार टन था ,जिसमें से चावल का उत्पादन 14745.9 हजार टन गेहूँ और दलहन का उत्पादन एक साथ 799.9 हजार टन और 154.4 हजार टन रहा।इसी अवधि में तिलहनों का उत्पादन 645.4 हजार टन और आलू का पाँच हजार बावन टन हुआ।वर्ष 2006-07 मे पटसन का उत्पादन 8411.5 हजार गांठें रहा पटसन,कपास और कागज की मिलों का प्रमुख केंद्र भाटपारा है।
भू-परिदृश्य और अर्थव्यवस्था, दोनों में कृषि की प्रधानता है। राज्य के प्रत्येक चार में से तीन व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि में संलग्न है। सापेक्षिक कृषि योग्य भूमि के कुल क्षेत्र ( 65 प्रतिशत )के मामले में पश्चिम बंगाल दूसरे राज्यों से आगे है।दार्जिलिंग को छोड़कर दूसरे सभी जिलों में धान की जिसे विस्तृत सिंचाई की आवश्यकता होती है।वह फसल प्रमुख है। देश के कुल चावल उत्पादन क्षेत्र का 14 प्रतिशत भाग पश्चिम बंगाल में होता है और देश की कुल उपज का 16 प्रतिशत काटता है।जूट जो दूसरी प्रमुख फसल है, विशेष रुप से बांग्लादेश की सीमांत और गंगा नदी के दक्षिणी जिलों में प्रमुखता से उपजाया जाता है।सभी दक्षिणी जिलों में गेहूँ और आलू को शीतकालीन फसल के रूप में उगाया जाता है।एक अरसे से दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी अपने उच्च गुणवत्ता वाली चाय के लिए प्रसिद्ध है।दार्जिलिंग में संतरा,सेब,अन्नानास, इलायची और अदरक भी होता है।राज्य के दक्षिणी और मध्य क्षेत्र में आम, तरबूज,और केले का व्यापक रूप से उत्पादन किया जाता है।
यहाँ औद्योगिक प्रोत्साहन तथा आर्थिक विकास के राज्य की नीति की प्रमुख विशेषताएँ विदेशी तकनीकी और निवेश को प्रोत्साहन देना है विद्युत उत्पादन में निजी क्षेत्र का निवेश तथा औद्योगिक ढाँचे का सुधार और उन्नयन करना है।पेट्रोरसायन,डाउनस्ट्रीम उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक तथा सूचना प्रौद्योगिकी, लौह एवं इस्पात, मेटलर्जी तथा इंजीनियरिंग, वस्त्र का उद्योग, चमड़े के उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण, औषधीय पौधे, खाद्य तेल, सब्जी का प्रसंस्करण,और एक्वाकल्चर पर ज्यादा जोर दिया जाता है।


पश्चिम बंगाल राज्य में 2007 के वक्त कार्यान्वित सबसे महत्वपूर्ण परियोजना जय बालाजी इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा 153.73 करोड़ रुपए की केप्टिव विद्युत संयंत्र परियोजना है जो समेकित इस्पात संयंत्र हैं।हुगली मेट कोप और विद्युत कंपनी लिमिटेड 140 करोड रुपए की लागत से मैट नर्जिकल कोक एंड पावर प्लांट,अंबुजा सीमेंट लिमिटेड 165 करोड रुपए की विशाल विस्तार परियोजना,फरक्का,मुर्शिदाबाद और आई.ओ.सी.एल 154.36 करोड़ रुपए वाली विस्तार परियोजना पूर्वी मेदिनीपुर पूर्व में की जानी है।छोटे इस्पात संयंत्र, स्पंज आयरन, ढलाई वाला पिग आयरन आदि मे भारी निवेश किया गया है।बिजली की आसानी से उपलब्धता, मालभाड़ा साम्यता को हटाने,उद्योग के लिए प्राकृतिक संसाधनों के पास स्थित होने तथा श्रमिक बल के पारंपरिक रूप से लौह और इस्पात इकाइयों में दक्षता पाए जाने के कारण इस क्षेत्र के निवेश में वृद्धि हुई है और वर्षों से सीमेंट के उद्योग में निवेश भी बढ़ गया है।जनवरी से अगस्त 2007 के वक्त 34 हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड अद्योगामी इकाइयों में 160.15 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है ।ये इकाइयाँ अधिक निर्माण प्लास्टिक मंदो में सलंग्न है ,जैसे बाल्टिया के पात्र ,मोल्डेड फर्नीचर ,बैटरी के पात्र,नायलॉन की जालियां घरेलू सामान आदि इसके राज्य क्षेत्र की विद्युत उत्पादन इकाइयां बंगाल पावर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, तापीय विद्युत उत्पादन के लिए, दुर्गापुर प्रोजेक्ट्स लिमिटेड, पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड,गैर परंपरागत ऊर्जा उत्पादन के लिए पश्चिम बंगाल नवीकरण ऊर्जा विकास एजेंसी है।केंद्र सरकार की दामोदर वैली कॉरपोरेशन और नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन के अतिरिक्त निजी क्षेत्र की सीईएससी लिमिटेड तथा देसरगढ़ पावर सप्लाई कॉरपोरेशन अन्य विद्युत उत्पादन इकाइयाँ हैं।
इसके राज्य में सात बड़ी तथा 34 मंझौली सिंचाई परियोजनाएं चलाई जा रही है।तीस्त बैराज परियोजना और स्वर्णरेखा बैराज परियोजना दो बड़ी सक्रिय परियोजनाएँ हैं।सुवर्णरेखा बैराज परियोजना के लिए झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इस बैराज्य से राज्य के पश्चिमी तथा पूर्वी मिदनापुर जिले में खरीफ तथा रबी सत्र मे एक साथ 99248 और 30766 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है।राज्य सरकार बांकुरा,बीरभूमि, बर्दवान, तथा पुरुलिया जिले में कई छोटी सिंचाई परियोजनाएं चला रही है।पुरुलिया की 32 परियोजनाएं मे से 25 पूरी हो चुकी है और सात वर्तमान में चल रही है जिसमें से दो पाटलोई तथा टटकू सिंचाई परियोजनाएं द्वारा 43,002 हजार हेक्टेयर की सिंचाई की जा रही है, जबकि चालू योजनाओं के पूरा हो जाने पर सिंचाई की क्षमता बढ़कर 8.21 हजार हेक्टेयर हो जाएगी।
यहाँ की महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र है
कोलकाता,दीघा(मिदनापुरे),बाक्खाली सी रिजॉर्ट,सागर द्वीप और सुंदरबन्स ( साउथ 24 परगना),बंदेल,ताराकेश्वर,कमरापुकार( हुगली),
गंधियारा ( हावड़ा), शांति निकेतन और बकरेश्वर (बिरभूम ) दुर्गापुर ( बर्दवान), मुकुटमणिपुर और विष्णुपुर। ( बाकुरा),अयोध्या पर्वत ( पुरुलिया), मुर्शिदाबाद,गौर,पडुवा ( मालदा), दार्जिलिंग, मिरीक, कालीमपोंग, संदाकफू और फलूत तथा कुर्सेयाग ( दार्जिलिंग) जलदापारा और डूअर्स ) ( जलपाईगुड़ी)इसके साथ ही अगर दूसरी पर्यटन शहर के बारे में बताएँ तो शांति निकेतन जो कि पश्चिम बंगाल ,भारत के बीरभूम जिले में बोलपुर के निकट एक छोटा शहर है,जो कोलकाता(पहले कलकत्ता) के लगभग 180 किलोमीटर उत्तर में स्थित है।इस शहर को प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्र नाथ टैगोर ने बनाया था और इसकी स्थापना रविंद्र नाथ टैगोर के द्वारा सन1901ईस्वी में की गई थी।टैगोर ने यहाँ विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और यह शहर प्रत्येक वर्ष हजारों पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया क्योंकि टैगोर ने अपनी कई साहित्यिक कृतियाँ यहाँ लिखी थी और यहाँ स्थित उनका घर ऐतिहासिक महत्व रखता है।22 दिसंबर 1901, देवेंद्रनाथ के बेटे, रविंद्रनाथ टैगोर पर बाद में शांति निकेतन में एक स्कूल शुरू ब्रह्मचारी आश्रमा नाम का प्राचीन गुरुकुल प्रणाली की तर्ज पर मॉडलिंग की थी। बाद मे वह नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया है, जो बढ़ाकर भारत की न केवल गर्व बल्कि शांति निकेतन की प्रेस्टीज स्कूल के एक विश्वविद्यालय में विस्तार किया। यह शिक्षा संस्थान सच के लिए खोज रहा था पूर्व और पश्चिम के तरीके सीखने के मिश्रण का उद्देश्य। विश्व भारती, एक सौ साल से अब और अधिक, मानविकी मे डिग्री पाठ्यक्रम के साथ भारत के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में से एक हैं,सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, ललित कला,संगीत, कला, शिक्षा, कृषि विज्ञान और ग्रामीण पुनर्निर्माण निर्माण प्रदर्शन, टैगोर के इशारे पर पाऊस वार्षिक उत्सव एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना बन गया जहाँ छात्रों और उनके स्कूल के शिक्षकों के एक सक्रिय हिस्सा है।शांति निकेतन में मौसम आमतौर पर एक सुखद एक यद्यपि सामान्य मौसम परिवर्तन भर में सर्दी और गर्मी में मानसून के दौरान आया होगा।लेकिन स्प्रिंग शांति निकेतन में सिर्फ इसलिए नहीं है कि अपने प्राकृतिक सौंदर्य के अपने आकर्षण के बीच अपनी पूरी प्रचुर हरियाली से खिल गया है, लेकिन यह भी प्रसिद्ध है वसंत उत्सव के कारण आयोजित स्प्रिंग की शुरुआत के साथ होली के त्यौहार का आगमन। इसके साथ ही दार्जिलिंग चाय के लिए प्रसिद्ध है, और मालदा आम के लिए प्रसिद्ध है।


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