हाल ही में जल को सुरक्षित रखने के लिए सतह और भूजल प्रशिक्षण शिक्षा और अनुसंधान में सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत ने किस देश के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किये है इसके बारे में विस्तार से बताइए?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की उपस्थिति में केंद्रीय मंत्रिमंडल को केंद्रीय भूजल बोर्ड(सीजीडब्ल्यूबी) जल संसाधन नदी विकास और गंगा के संरक्षण विभाग भारत और मैनेजिंग एक्विफर रिचार्ज एंड सस्टेनिंग ग्राउंड वाटर यूज थ्रू विलेज लेवल इंटरवेंशन (एमएआरवीआई) के पार्टनर के ऑस्ट्रेलिया के बीच वर्ष 2019 के अक्टूबर महीने में समझौता (एमओयू) ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया। और इसके हस्ताक्षर करने का मुख्य उद्देश्य यही था कि कृषि ,शहरी औद्योगिक ,और पर्यावरण उद्देश्य के लिए जल्द सुरक्षा को प्राप्त करने के लिए भूजल प्रशिक्षण शिक्षा और अनुसंधान में सहयोग करने के लिए बढ़ावा दें। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नए शक्ति के निर्माण अनुसंधान एवं विकास और सतत भूजल प्रबंधन को बेहतर बनाने की दिशा में ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। और इसी के साथ सतत भूजल प्रबंधन को असरदार बनाने में सहयोग के लिए बुधवार को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच समझौता ज्ञापन को मंजूरी देने के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने इस समझौते की जानकारी दी।
यदि हम भूजल के बारे में बताए तो भूजल वह जल होता है जो चट्टानों और मिट्टी के नीचे के सबसे गहराई वाले भाग मे मौजूद रहती है और जमीन के नीचे जमा है और जिस चट्टानों के बीच यह भूजल जमा होता है उन्हें जलभृत(एक्विफर) कहा जाता है यह बजरी ,रेत, बलुआ पत्थर या चूना पत्थर से बने होते हैं और इनके चट्टानों के बीच मे ऐसी बड़ी और आपस में जुड़ी हुई ऐसी जगह होती है इसकी वजह से चट्टानों के रास्ते बन जाते हैं प्रवेश के लिए और इसी चट्टानों से पानी नीचे बह जाता है। और जिस जगह पर पानी जमा हो जाता है वे संतृप्त जोन (सैचुरेटेड जोन) कहलाते हैं और जिस सतह के गहराई पर पानी ज्यादा भरा होता है उसके जल के स्तर को( वाटर टेबल) कहते हैं
इसके जल के जमाव को निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा गया है
प्रायद्वीपीय भारत में कठोर चट्टान वाले जलभृत भारत के सभी जलभृत क्षेत्र का भाग 65% कठोर चट्टानों से बना है और इनमें से सबसे अधिक मध्य प्रायद्वीपीय में भारत में है और वहां की जमीन कठोर चट्टानों से बनी होती है।
सिंधु गंगा के मैदानों ( उत्तर भारतीय नदी क्षेत्र )मे कक्षारी जलभृत उत्तर भारत में गंगा और सिंधू के मैदानों में पाए जाने वाले सभी जलभृतो में पानी के संग्रहण करने की विशेष महत्व है इसीलिए उन्हें जलापूर्ति का बहुमूल्य स्रोत माना जाता है
भारत भूजल के अधिक उपयोग करने पर संकट की ओर तेजी से बढ़ रहा है जल का अत्यधिक उपयोग उस परिस्थिति को कहते हैं जब एक समय के बाद जलभृतो की औसत निकासी दर औसत पुनर्भरण भरण की दर से अधिक होती है और इसके अपेक्षा सतही जल की उपलब्धता अधिक है लेकिन फिर भी इसके कमियो के बावजूद यह अधिक उपयोग सिंचाई के लिए होता है और इसके सिंचाई के मुख्य साधनों में से नहरे , टैंक और ट्यूबवेल है इन सभी जल के स्रोतों में भूजल की अहम भूमिका है।
सरकार हर वक्त लोगों में यह जागरूकता को बढ़ाने का प्रयास करती है कि भूजल का उपयोग सामुदायिक संसाधन के रूप में करनी चाहिए और हर जमीन के मालिक को अपने सीमा के अंदर आने वाली जमीन के नीचे और उसकी सतह पर मौजूद उस पानी को इकट्ठा करने और उसे सुरक्षित रखने का अधिकार है वह मालिक अपनी जमीन में कुए खोद सकता है अपने उपयोग के हिसाब से पानी को निकाल सकते हैं
सीजीडब्ल्यूबी राज्यो में सबसे अधिक पानी का दुरुपयोग उस क्षेत्र के गंभीर स्थिति के बारे में बताती हैं लेकिन बोर्ड के पास इन क्षेत्रों में पानी के दुरुपयोग को रोकने का अधिकार नहीं है केवल जमीन के मालिक को ही सूचना दे सकती हैं इसके अलावा भूजल के छोटे उपयोग करने वाले लोगों की संख्या में भी काफी बढ़ोतरी हो गई है इन्हीं वजह से बोर्ड के लिए उन्हें पहचान करके दंड दे पाना काफी मुश्किल हो गया है।

भारत के भू जल के स्रोतों में प्रदूषण काफी बढ़ती जा रही हैं जैसे कि आर्सनिक, नाइट्रेट, फ्लोराइड,और इस प्रदूषण की मौजूदगी के बावजूद केंद्र सरकार या राज्य इसमे कोई कार्यक्रम लागू नहीं कर रही है और नहीं इसे सही तरीके से नियंत्रित करती है। और इसके अलावा नदियों,झीलों और भूजल के स्रोतों में होने वाले जल प्रदूषण को केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड और सीजीडब्ल्यूबी उनका देखरेख नहीं करते हैं देश के लोगों को यह प्रयास करना चाहिए कि किस प्रकार भूजल के प्रदूषण को रोका जाए और इसे नियंत्रित करने के लिए हर प्रकार की तकनीक को अपनाना चाहिए जैसे की इकोसिस्टम और मानव के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए झीलों, नदियों और भूजल के लिए पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को अच्छी गुणवत्ता के लिए हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए। पेड़ की अत्यधिक कटाई को रोकना चाहिए जिससे पर्यावरण सुरक्षित रहे और जो लोग पानी का दुरुपयोग करते हैं उनसे भी दंड वसूलना चाहिए झिलो को सुरक्षित रखने के लिए और उनसे जुड़ी परिजनों के अंतर्गत जलाशयों में जाने वाली सीवेज और कृषि अपवाह के स्त्रोत को नियंत्रित किया जा सके ऐसी प्रबंध राज्य में किया जाना चाहिए।
कुछ लोग अपने जल संसाधनों का सफलतापूर्वक प्रबंध कर रहे हैं और यह सुझाव उन्हें योजना आयोग द्वारा दिया गया कि किस प्रकार भूजल को सुरक्षित रखा जा सके इसके लिए लोगों ने कई तरीके अपनाएं जैसे किः-
ऐसी जगह की पहचान करना जहां भूजल फिर से भरा जा सके और इसके संतुलन को बरकरार रखने के लिए गांव या वाटरशेड के स्तर को सही तरीके से रखना।
भूजल का उपयोग सबसे अधिक कृषि में होता है इसकी वजह से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, और राजस्थान के राज्यों के जलस्तर मे काफी गिरावट हो चुकी हैं भूजल की कमियों को रोकने के लिए कई तरीके को अपनाया गया है जैसे कि जल प्रबंधन के नए तकनीक सिंचाई की बेहतर पद्धतियों को अपनाना चाहिए भूजल को फिर से भरने के लिए मास्टर प्लान का उपयोग करना चाहिए कि कैसे भूजल फिर से उपयोग में ला सके बिजली की बढ़ती दर से देश के किसानों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और सरकार का इसमें यही योगदान होना चाहिए किस प्रकार दर को कम कर दें।
पानी के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।इसलिए हमें अपने जीवन में जल के महत्व को समझना चाहिए और जल को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। आज स्वच्छ जल की जरूरत सबसे बड़ी समस्या बन कर विश्व के सामने खड़ी है। पिछले दो वर्षों में,भारत के बहुत से भागों में अत्यधिक मात्रा में भूजल निकालने से जल स्तर बड़ी भूमिगत जल स्तर में गिरावट का विपरीत प्रभाव प्राकृतिक संपदा, पर्यावरण पेयजल की उपलब्धता, कृषि क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र आदि पर सीधे तौर पर पड़ रहा हैं।
भारत में जल को सुरक्षित रखने और उसके प्रबन्धन का इतिहास बहुत पुराना है जिसके तथ्य सबसे पहले सिंधु घाटी में पाए गए थे। तब से आज तक देश के बहुत से क्षेत्रो में आवश्यकता के अनुसार जल की बचत और उसके प्रबन्धन को अपनाया जाता रहा है, जैसे राजस्थान में खड़ीन, कुंड और नाडी, महाराष्ट्र में बन्धारा और ताल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बन्धी, हिमाचल में कुहल, तमिलनाडु में एरी, केरल में सुरंगम, जम्मू क्षेत्र के कांडी इलाके के पोखर, कर्नाटक में कट्टा पानी को सहेजने और एक जगह से दूसरी जगह प्रवाहित करने के कुछ अति प्राचीन साधन थे, जो आज भी प्रचलन में हैं।पृथ्वी पर मौजूद पानी का लगातार वाष्पीकरण होता रहता है और यही पानी वर्षा जल के रुप में फिर से धरती पर बरसता है। इस पूरे घटनाक्रम को जल चक्र के रुप में जानते हैं। वर्षा के रुप में पृथ्वी पर गिरने वाला पानी कई माध्यमों से मिट्टी में समाहित होकर भूमिगत जल स्तर तक पहुँचता है और भूजल स्तर की मात्रा में वृद्धि करता हैं। इसी घटना को हम भूजल पुनर्भरण कहते हैं। भूजल पुनर्भरण को हम दो रुपो में बांट सकते हैं।
वर्षा जल एकमात्र स्रोत है जो पृथ्वी पर जल की आवश्यकता, मृदा नमी, भूमिगत जल पुनर्भरण आदि के लिए प्रमुख स्रोत हैं। वर्षा जल ही अन्य स्रोतों जैसे नदियाँ, धाराएँ, जलासय, झील एवं कृषि सिंचाई के माध्यम से भूमिगत जल एवं मृदा नमी में प्राकृतिक रुप से वृद्धि होती रहती हैं।
क्षेत्र में पहले से विद्यमान कुओं एवं कुण्डों का, जो किसी कारण उपयोग नही किये जा रहे हैं, पुनर्भरण संरचना के रुप में संशोधित किया जा सकता है। क्षेत्र के कुओं और टैंकों की सफाई करते वक्त बचे हुए जल के अपशिष्ट जल को इन कुओं तक पहुँचा कर इन्हे पुनर्भरण संरचना के रुप में उपयोग किया जा सकता हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र औत कर्नाटक आदि राज्यों में इस प्रकार की संरचनाओं का निर्माण कुशलता पूर्वक किया गया हैं।
हमारे देश में जल संसाधनों के प्रबंधन का इतिहास बहुत पुराना है। प्राचीन काल से ही भारत के नागरिकों ने सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ-साथ भारत की जलवायु, मिट्टी की प्रकृति और अन्य विविधताओं को ध्यान में रखकर बरसाती पानी, नदी-नालों, झरनों और जमीन के नीचे मिलने वाले, भूजल संसाधनों के विकास और प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर ली थी। जल प्रबंधन का पहला प्रमाण सिंधु घाटी में खुदाई के दौरान मिला। धौरावीरा में अनेक जलाशयों के प्रमाण भी मिले हैं। इस क्षेत्र में बाढ़ के पानी की निकासी की बहुत ही अच्छी व्यवस्था की गई थी। इसी प्रकार कुएँ बनाने की कला का विकास भी हड़प्पा काल में हुआ था।
जल प्रबंधन की शुरुआत कृषि क्षेत्र से करनी चाहिए क्योंकि सबसे अधिक मात्रा में कृषि के कार्य में ही जल का उपयोग किया जाता है तथा सिंचाई में जल का उचित इस्तेमाल बहुत आवश्यक है। लोगो में यह धारणा है कि अधिक पानी से खेती की उपज अधिक होती है अधिक पानी अधिक उपज, जो कि गलत विचारधारा है। फसलों के उत्पादन में सिंचाई का योगदान 15-16 प्रतिशत होता है। फसल के लिये भरपूर पानी का मतलब मात्र मिट्टी में पर्याप्त नमी ही होती है। लेकिन वर्तमान कृषि पद्धति में सिंचाई का अत्यधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। धरती के गर्भ से पानी की आखिरी बूँद भी खींचने की कोशिश की जा रही है खेतों के समतलीकरण से सिंचाई में जल का दुरुपयोग रोका जा सकता है। फसलों को जीवन रक्षक या पूरक सिंचाई देकर उपज को दोगुना किया जा सकता है। पानी लगाते समय या सिंचाई करते समय यह ध्यान रहे कि सिंचाई पौधे या पौध में की जा रही है न कि भूमि में । खेतो में सिंचाई करने के लिये आधुनिक तकनिको का उपयोग एवं जल का उचित प्रबंधन कर उत्पादन को भी बढ़ाया जा सकता हैं परंपरगत सिंचाई तकनिकों के स्थान पर आवश्यकता के अनुरुप कुछ सामान्य बदलाव के साथ आधुनिक सिंचाई पद्वतियों का उपयोग कर सिंचाई क्षेत्र बढ़ाने के साथ-साथ उत्पादन को भी बढ़ाया जा सकता हैं। आधुनिक सिंचाई पध्दतियों में से कुछ प्रमुख इस प्रकार है।
बौछारी या स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई में पानी को छिड़काव के रूप में दिया जाता है। जिससे पानी पौधों पर वर्षा की बूंदों जैसी पड़ती हैं। पानी की बचत और उत्पादन की अधिक पैदावार के लिहाज से बौछारी सिंचाई प्रणाली अति उपयोगी और वैज्ञानिक तरीका मानी गई है।
ड्रिप प्रणाली सिंचाई की सबसे अच्छी विधि है, जिसके प्रयोग से सिंचाई जल की पर्याप्त बचत की जा सकती है। यह विधि मृदा के प्रकार, खेत के ढाल, जल के स्त्रोत और किसान की योग्यता के अनुसार अधिकतर फसलों के लिए अपनाई जा सकती हैं। जिससे जल की बचत की जा सकती है।
देश में जनसंख्या में वृद्धि के साथ साफ पानी की मांग भी बढ़ती जा रही है और इसी जरूरत को पुरा करना एक बहुत बढ़ी समस्या है। वर्तमान में पानी की समस्या शहरी क्षेत्रो में ही नहीं बल्की ग्रामीण क्षेत्रो मे भी विकराल रुप लेती जा रही है। इस समस्या से निपटने के लिये सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा बहुत से कार्य किये जा रहे है, लेकिन उनका यह कार्य सही दिशा में नहीं जा रहा है इस समस्या के प्रति देश के हर नागरिक को जल का सही उपयोग करने के लिये जागरूक करने की जरूरत है। सभी लोगो को रोजमर्रा के जीवन में पानी का उपयोग करते समय पानी की बचत से सम्बंधित कुछ सामन्य सी बातो का ध्यान रखे तो पानी की समस्या से निपटने में बहुत बड़ी सहायता मिल सकती हैं। आवासीय क्षेत्रो में जल प्रबंधन के लिये आवश्यक रुप से अपनाये जाने योग्य कुछ साधारण उपाय इस प्रकार है ।
घरो, कॉलोनियों अथवा किसी भी प्रकार के रहने की भवनों को बनाते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चहिये कि उसे जगह में वर्षा जल के संचयन का प्रावधान किया गया है।उद्योगो मे बहुत बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग होना बड़ी समस्या नहीं है लेकिन इन उद्योगो से कई तरह के रसायनो से युक्त प्रदूषित जल का बिना परीक्षण किए निकलना बहुत बड़ी समस्या है। आज देश के कई भागो में उद्योगो के द्वारा उपयोग किये जा रहे जल के मुकाबले कई गुना ज्यादा, प्रदूषित पानी इनसे निकलता है प्रदूषित जल के कारण बर्बाद हो रहा है। देश के कई क्षेत्रो में साफ पानी के स्रोत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन उद्योगो के द्वारा निकलते प्रदूषित जल के कारण इन स्रोतो का पानी उपयोग करने के लायक नहीं, रहा जिसके कारण इन क्षेत्रों में भी जल संकट पैदा हो गया है।
इस समस्या से निपटने के लिए जल प्रबंधन के साथ-साथ भूजल को सुरक्षित और उसको फिर से भरने पर भी विशेष ध्यान देने कि आवश्यकता है। भूजल संचयन को बचाए रखने के लिए और उसे फिर से भरने के लिए के लिए उसके अनुसार जगह और प्रकृतिक अथवा कृत्रिम तकनीकों को अपनाया जा सकता है। जहाँ जल का सबसे अधिक उपयोग होता है जैसे कि कृषि क्षेत्र,आवासीय क्षेत्र, और औद्योगिक क्षेत्र मे भी जल प्रबंधन को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है भूजल संचयन एवं प्रबंधन के लिए क्षेत्रानुसार छोटे बाँध या नाला बाँध, कुओं, कुण्डों एवं हाथ पंपों का पुनर्भरण, आदि तकनीको को अपना कर समस्या के निवारण की कोशिस की जानी चाहिये।

यदि ऑस्ट्रेलिया के बारे में कहा जाए तो
ऑस्ट्रेलिया दुनिया का सबसे छोटा महाद्वीप होने के साथ-साथ एक देश भी है और यह महाद्वीप दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है। इसकी राजधानी
कैनबरा है। यह ऑस्ट्रेलिया का महत्वपूर्ण शहर है ऑस्ट्रेलिया सरकार के सभी सरकारी कार्यालय कैनबरा में स्थित है। इसकी स्थापना 26 जनवरी 1788 मे हुई। ऑस्ट्रेलिया को कॉमनवेल्थ ऑफ ऑस्ट्रेलिया भी कहा जाता है। इसका सेंट्रल बैंक रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया है। इस महाद्वीप के चारों और महासागर का विस्तार होने के कारण इसे ओसिनीया महाद्वीप कहते हैं।
इस महाद्वीप का नाम न्यू होलैण्ड रखा गया सबसे पहले होलैण्ड के निवासी डच कप्तान विलियम जेम्स के द्वारा। यह महाद्वीप हिंद महासागर और प्रशांत महासागर से घिरा है ऑस्ट्रेलिया एशिया से समुद्रों के कारण बटा हुआ है इसकी तटरेखा 34218 km (लगभग 21,262 मील) है मकर रेखा इसके मध्य से होकर गुजरती है और इसके खोजकर्ता ऐबेल तस्मान और कप्तान जेम्स कुक को माना जाता है।
यदि हम ऑस्ट्रेलिया का इतिहास के बारे में कहे तो ऑस्ट्रेलिया और इससे पहले के मूल-निवासी और औपनिवेशिक समाजों के क्षेत्र और लोगों के इतिहास के बारे में बताते है। ऐसा माना जाता है कि ऑस्ट्रेलिया की विशेष जमीन पर ऑस्ट्रेलिया के निवासीयों का पहली बार आना लगभग 40,000 से 60,000 वर्षों के पहले इंडोनेशियाई द्वीप-समूह से नाव द्वारा हुआ।वे लोग पृथ्वी पर सबसे लंबे समय तक बचे रहने के लिये कलात्मक, संगीतमय और आध्यात्मिक परंपराओं को अपनाने लगे। और इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया में सोने की खानों और कृषि उद्योगों के कारण समृद्धि आई और उन्नीसवीं सदी के बीच में सभी छः ब्रिटिश उपनिवेशों में शामिल संसदीय लोकतंत्रों की स्थापना की शुरुआत हुई। विश्व-युद्धों में ऑस्ट्रेलिया ब्रिटेन की ओर से लड़ा और दूसरी विश्वयुद्ध के समय शाही जापान द्वारा संयुक्त राज्य अमरीका को धमकी मिलने पर ऑस्ट्रेलिया संयुक्त राज्य अमरीका का लंबे समय तक मित्र बना रहा। एशिया के साथ उसके व्यापार में बढ़ोतरी हुई और युद्ध के समय एक बहु-सांस्कृतिक आप्रवास कार्यक्रम के द्वारा 6.5 मिलियन से अधिक प्रवासी वहां गए। जिनमें से हर महाद्वीप के लोग शामिल थे। अगले छः वर्षों में जनसंख्या तिगुनी होकर 2010 में लगभग 21 मिलियन तक पहुँच गई, जहाँ 200 देशों के मूल नागरिक मिलकर विश्व की चौदहवीं सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था का निर्माण करते हैं ।
आस्ट्रेलिया के डालर वर्तमान में अमेरिकी डॉलर, यूरो, येन, पाउंड स्टर्लिंग और स्विस फ्रांक के बाद विदेशी विनियम बाजार में छठवीं सर्वाधिक प्रचलित मुद्रा है। ऑस्ट्रेलिया में ज्यादा ब्याज दर, विदेशी विनियम बाजार में सरकार का हस्ताक्षेप कम होने, ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था के कमोबेश स्थिर होने और अन्य मुद्राओं की तुलना में विविधता की चाह रखने की वजह से यह मुद्रा करेंसी ट्रेडर्स के बीच काफी लोकप्रिय है।

पारंपरिक रूप से ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी समाज को चलाने के लिए वरिष्ठ जनों की समितियों और व्यापारिक निर्णय प्रक्रिया के द्वारा किया जाता था, लेकिन सन 1788 के बाद स्थापित यूरोपीय-शैली की शुरुआत की सरकारें शामिल हुआ करतीं थीं और उनको चलाने के लिए नियुक्त किये गए गवर्नरों द्वारा किया जाता था – लेकिन अधिप्राप्ति के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ रिसेप्शन )के आधार पर ऑस्ट्रेलियाई उपनिवेशों में अंग्रेज़ी विधि को लाई गई और इसी तरह उपनिवेशवादी मैग्ना कार्टा तथा बिल ऑफ राइट्स 1689 द्वारा स्थापित अधिकारों व प्रक्रियाओं की अवधारणा को ब्रिटेन से लाये। उपनिवेशों की स्थापना के बाद जल्द ही प्रतिनिधिक सरकार के गठन के लिए प्रदर्शन शुरु हो गए। पर सूचना के सिद्धांतों को लागू करने का प्रयास किया, जिसके जरिए, ज्यूरी के अधिकार पहले मुक्त हो चुके व्यक्तियों तक विस्तारित करके और उसके बाद अपराधियों, सेवकों और ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों तक सुरक्षा का विस्तार करके, कानून के समक्ष बराबरी के सिद्धांत का पालन किया गया।
एक ऐतिहासिक विकास था, जिसने न्यू साउथ वेल्स, विक्टोरिया, साउथ ऑस्ट्रेलिया और तस्मानिया को प्रतिनिधिक संविधान प्रदान किये और ये उपनिवेश ऐसे संविधानों के लेखन के लिए उत्साह के साथ तैयार हो गए, जिनके फलस्वरूप लोकतांत्रिक रूप से संसदों का जन्म हुआ लेकिन मुख्य रूप से ये संविधान सामाजिक और आर्थिक “हितों” के प्रतिनिधियों के रूप में औपनिवेशिक उच्च सदन की भूमिका निभाते रहे और सभी ने संवैधानिक राजतंत्रों की स्थापना की, जिनमें ब्रिटेन की महारानी राज्य की सांकेतिक प्रमुख थीं।सन 1855 में, लंदन के द्वारा न्यू साउथ वेल्स, विक्टोरिया, साउथ ऑस्ट्रेलिया व तस्मानिया को सीमित रूप से शासन का अधिकार प्रदान किया गया। सन 1856 में, विक्टोरिया, तस्मानिया और साउथ ऑस्ट्रेलिया में पहली बार गुप्त मतदान की अभिनव अवधारणा प्रस्तुत की गई, जिसमें सरकार ने उम्मीदवारों के नामों वाले मतपत्र प्रदान किये और मतदाता गुप्त-रूप से उम्मीदवार का चयन कर सकते थे। इस प्रणाली को पूरी दुनिया में अपनाया गया और इसे “ऑस्ट्रेलियाई मतपत्र” के नाम से जाना जाने लगा। सन 1855 में ही साउथ ऑस्ट्रेलिया में 21 वर्ष या उससे अधिक आयु की समस्त पुरुष ब्रिटिश प्रजा को मतदान का अधिकार प्रदान किया गया। इस अधिकार को सन 1857 में विक्टोरिया तक और अगले वर्ष न्यू साउथ वेल्स तक विस्तारित किया गया। अन्य उपनिवेशों ने भी इसका पालन किया और सन 1896 में तस्मानिया समस्त पुरुषों को मताधिकार प्रदान करने वाला अंतिम उपनिवेश बना।
सन 1861 में साउथ ऑस्ट्रेलिया के उपनिवेश में संपत्तिधारी महिलाओं को स्थानीय चुनावों में (लेकिन संसदीय चुनावों में नहीं) मतदान करने का अधिकार प्रदान किया गया। सन 1884 में, हेनरिटा ने मेलबर्न, विक्टोरिया में ऑस्ट्रेलियाई महिला मतदाताओं के पहले संगठन की स्थापना की। सन 1895 में महिलाओं को पार्लियामेंट ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया के लिए मतदान करने का अधिकार मिला। जब विक्टोरिया, न्यू साउथ वेल्स, तस्मानिया तथा साउथ ऑस्ट्रेलिया ने 21 वर्ष से अधिक आयु वाली समस्त पुरुष ब्रिटिश प्रजा को मतदान करने का अधिकार का अधिकार दिया तो सामान्य रूप से इसी काल में ऑस्ट्रेलिया के मूल-निवासी पुरुषों को भी कानूनी रूप से मतदान का अधिकार मिल गया – केवल क्वीन्सलैंड और वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया ने ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों को मता देने के अधिकार से वंचित रखा इस प्रकार, ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी पुरुषों और महिलाओं ने सन 1901 में पहली राष्ट्रमंडल संसद के लिए कुछ न्याय-क्षेत्रों में मतदान किया। हालांकि शुरुआती संघीय संसदीय सुधारों और न्यायिक व्याख्याओं ने व्यावहार में ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के मताधिकार को सीमित करने का प्रयास किया – यह स्थिति सन 1940 के दशक में अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा अभियान छेड़े जाने तक बनी रही।
हालांकि ऑस्ट्रेलिया की विभिन्न संसदें लगातार बनतीं रहीं हैं, लेकिन चयनित संसदीय सरकार के मुख्य आधार ने ऑस्ट्रेलिया में सन 1850 के दशक से लेकर इक्कीसवीं सदी में प्रवेश तक भी अपनी ऐतिहासिक निरंतरता कायम रखी है।