राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस कब मनाया जाता है?तथा इस जोखिम से लोगों को किस प्रकार की हानियां उठानी पड़ी और इस आपदा से बचने के लिए लोगों ने किस प्रकार नये तरीके को अपनाया इसके बारे में विस्तार से बताइए?
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1989 में हर साल के अक्टूबर महीने के दूसरे बुधवार को इस दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी लेकिन बाद में 21 दिसंबर 2009 को संयुक्त राष्ट्र ने हर साल 13 अक्टूबर को इस दिन के रूप में मनाने का फैसला किया । यह दिवस को मनाने से हमारे देश के हर नागरिक और सरकार को प्रेरणा मिलती है कि कैसे इस आपदा का बचाव किया जाए और अधिक शक्ति वाले समुदाय और राष्ट्र के निर्माण में देश की हर नागरिक को भागीदार बनाया जाए,और इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य यही भी है कि इसके द्वारा लोगो मे जागरूकता फैलाई जाए कि किस प्रकार जोखिम से बचने के नये नये तरीके को अपनाया जा सके यही बात लोगों को समझाने और उनमें जागरूकता को बढ़ाने के लिए मनाया जाता है जैसे कि आपदा से होने वाले खतरों की जोखिम को किस प्रकार कम किया जाए इसके लिए हमें अच्छी जमीन और प्रदूषण रहित उचित वातावरण और कई संसाधनों का उचित प्रबंधन पहले से ही कर लेना चाहिए और इस भारी संकट से निपटने के लिए हमें अलग-अलग लोगों के समूहों को सभी जगह से मिलाकर उन्हें इस आपदा से निपटने के लिए विशेष तैयारी में सुधार कैसे किया जाए यह लोगों को बताना चाहिए। और इस आपदा से होने वाले कई घटनाओं को किस प्रकार से नियंत्रित किया जाए ताकि हमें आपदा आने से पहले ही पूरा तैयारी कर लेना चाहिए इसकी आने की चेतावनी हमें पहले से ही मिल जाए ताकि हम इस जोखिम को कम कर सके।
प्राकृतिक आपदा को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस हमारे पर्यावरण में होने वाले बदलाव के स्थिति के बारे मे सावधानियां बढ़ाने के लिए हर साल मनाया जाता है। यह लोगों में एक नई प्रेरणा की उम्मीद को जगाती है जिससे बाहर आने के लिए लाखों लोगों को आगे आना चाहिए और उनके प्रयासों के बारे में बात करने के लिए लोगों को हिम्मत देना चाहिए ताकि वे इस खतरे को समझ सकें, जिसके कारण लोगों को अपने कई कीमती वस्तुएं उनका अपना घर और कई ऐसे लोग जो इस आपदा के कारण अपनी जान गवा चुके हैं इस तरह का भारी नुकसान लोगों को हुआ है। प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए ये लोग जागरूकता बढ़ाने की अभियानों में शामिल होने के लिए दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं। और इसी आपदा के बचाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय दिवस पर कई गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।
यह दिन जोखिम और आपदा को कम करने के लिए और विश्व की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है और साथ ही इसे दुनिया भर के लोग और समुदाय आपदाओं के अपने जोखिम को किस प्रकार कम कर रहे हैं और कैसे अपने सामने आने वाले खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने वालो को चिन्हित करने के लिए भी मनाया जाता है।
इसमे आपदा प्रभावित लोगों की संख्या में कमी और आर्थिक नुकसान को कम कर सकते हैं। कोविड-19 भी एक प्रकार की आपदा जैसी ही है और जलवायु आपातकालीन के कहने के अनुसार जनता की भलाई के लिए वैज्ञानिक तथ्य पर कार्य करने वाली एक स्पष्ट योजना और सक्षम, और सशक्त संस्थाओं की आवश्यकता है।

सन 1989 में अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस मनाई गई थी। जोखिम जागरूकता और आपदा में कमी वैश्विक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा। 13अक्टूबर, 2016 को संपूर्ण विश्व में ‘अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस’ मनाया गया।
वर्ष 2016 में इस दिवस का मुख्य विषय रहने के लिए जीना और लोगो मे जागरूकता को बढ़ाना,और इसके साथ ही मृत्यु दर को कम करना था।
सन 1989 में यह दिवस विश्व में जोखिम प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र सभा द्वारा शुरुआत किया गया था। शुरुआत में यह दिवस हर वर्ष अक्टूबर महीने के पहले बुधवार को मनाया जाता था।
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2009 में 13 अक्टूबर को हर वर्ष यह दिवस मनाए जाने का प्रस्ताव रखा गया।
और यह पूरे विश्व में 13 अक्टूबर 2018 को अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस के रूप में मनाया गया। यह दिवस आपदा से बचाव के लिए और समाज का निर्माण करने के लिए नागरिकों तथा सरकार को प्रोत्साहित करता है। इसका मुख्य उद्देश्य है आपदा जोखिम को कम करना और सुरक्षित समुदाय बनाना।
वर्ष 2018 के अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस का मुख्य विषय ‘आपदा से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करना’ ( रिड्यूजिंग डिजास्टर इकोनामिक लॉसेस) रखा गया है।
संयुक्त राष्ट्र डाटा के अनुसार, विश्वभर की आपदाओं में जान गंवाने वाले महिलाओं और बच्चों की संख्या पुरुषों के मुकाबले 14 प्रतिशत अधिक है,यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र के डाटा मे बताई गई है जबकि 60 प्रतिशत महिलाओं की मृत्यु बचाव करने की स्थितियों में होती है और यह आंकड़ा 53 प्रतिशत है पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में इसमें दूसरे प्रभावित लोगों और समूहों में दिव्यांग लोगों के साथ रहने वाले व्यक्ति भी शामिल हैं।
खतरों की जोखिम को कम करने के लिए और भूमि और पर्यावरण के संसाधनों का उचित प्रबंधन, व आपदाओं से निपटने के लिए समुदाय विशेष की तैयारी में सुधार करना और ऐसे कई विनाशकारी घटनाए जो कि आपदा के कारण होती हैं उसके लिए पहले से चेतावनी जारी करना और आपदा के जोखिम को कम करने का मुख्य लक्ष्य यही है आज पूरे विश्व में कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं इसके जोखिम को कम करने के लिए क्योंकि यह प्राकृतिक आपदा है जो कहीं पर भी आ सकती है और हमें इनसे बचाव के लिए पहले से सुरक्षा अपनानी चाहिए।
इन कार्यक्रमों में कई समूहों के लोग एक साथ मिलकर विचार विमर्श करते हैं और इस कार्यक्रम के आयोजन करने का मुख्य उद्देश्य यह भी रहता है कि अब प्रकृति से छेड़छाड़ को रोका जा सके और पृथ्वी पर जीवों के अस्तित्व को बचाया जा सके। क्योंकि आज पूरे विश्व में वृक्षों की कटाई दिन पर दिन बढ़ती जा रही है और इसी के साथ मिट्टी का क्षरण और प्रदूषण, जल और वायु प्रदूषण भी बढ़ते जा रहे हैं जिनकी वजह से लोगों को काफी परेशानियां हो रही है और यही सब हमारे वजूद को खतरे में डाल रहे हैं। इसी बात को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 13 अक्तूबर को अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2009 से ही हुई। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अक्टूबर के दूसरे बुधवार को प्राकृतिक आपदा को कम करने के जितने भी अंतरराष्ट्रीय और नई तकनीक जिसमें की आपदा को कम किया जा सके उन सारे प्रयासों का पालन करने का निर्णय लिया। बाद में इसमें संशोधित कर वर्ष 2018 में इसे 13 अक्तूबर की तिथि तय की गई और अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस के रूप में मनाई गई
अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस मनाने मुख्य का उद्देश्य निम्नलिखित है:-
अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए और लोगों में जागरूकता को विकसित कर सके।
यह हर वर्ष 13 अक्टूबर को ही अंतरराष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
इस दिवस को मनाने का उद्देश्य यही है की विश्व में जोखिम प्रबंधन के प्रति जागरुकता को बढ़ाया जा सके और आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
यह दिवस देश के हर नागरिक और सरकार को एक नई दिशा प्रदान करता है जिनसे उन्हें प्रेरणा मिलती है इस जोखिम से किस तरह बाहर आया जाए और उनका यही प्रयास रहता है अधिक शक्ति वाले समुदाय लोग राष्ट्रों के निर्माण में भाग ले सकें।
और यदि प्राकृतिक आपदा के बारे में कहा जाए तो यह आपदा एक प्राकृतिक जोखिम (नेचुरल हजार्ड) का परिणाम है जैसे की ज्वालामुखी विस्फोट ( वोल्केनिक ईरप्शन ) भूकंप है जो कि मानव के गतिविधियों को प्रभावित करता है। मानव के दुर्बलताओं को उचित योजना और आपातकालीन प्रबंधन ( इमरजेंसी मैनेजमेंट) का आभाव और बढ़ा देता है, जिसकी वजह से आर्थिक रूप से मनुष्य को और पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। आज प्रदूषण दिन पर दिन बढ़ती जा रही है जिसके वजह से पर्यावरण मे भी बहुत दूषित वायु फैल गई है और इन्हीं कारणों से होने वाली हानि निर्भर करती है जनसँख्या की आपदा को बढ़ाने में और उसका विरोध करने की क्षमता पर,मतलब उनके लचीलेपन पर। और हमारे विचार से जब जोखिम और दुर्बलता एक साथ मिलती है। तब दुर्घटनाएं घटती हैं और जिन इलाकों में ऐसी कमजोरियां नहीं होती है वहां पर भी एक प्रकृति आपदा जगह ले सकती है जैसे कि उदाहरण के रूप में निर्जन प्रदेश में एक शक्तिशाली भूकंप का आना और मानव की भागीदारी के घटनाएँ जिसमें उन्हें भूकंप के कारण कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और यह जोखिम खुद से नहीं आती है इसके लिए प्रकृति को ही जिम्मेदार बताया जाता है ।
प्राकृतिक जोखिम किसी ऐसी घटना के घटने की नकारात्मक प्रभाव को कहते हैं जिसमें की मनुष्य और पर्यावरण दोनो को प्राकृतिक जोखिम का सामना करना पड़ता है उन पर भी यह घटना घटने की संभावना रहती है। इसमें कई तरह के प्राकृतिक खतरे शामिल है जैसे की भूकंप सूनामी ला सकते हैं, जिससे मानव जन को काफी नुकसान पहुंचता है और इसके अलावा सूखा सीधे तौर पर अकाल की समस्या को पैदा कर सकती है क्योंकि जल ही जीवन है और जल के बिना मनुष्य का जीवन कुछ भी नहीं जो की आज बहुत बड़ी समस्या बन चुकी है हमारे देश के लिये और ऐसी कई बीमारियाँ भी पैदा करता है। यदि खतरा और आपदा दोनों को आपस में बांटा जाए तो इसका एक और उदहारण भी है जैसे की 1906 में सैन फ्रांसिस्को में आया भूकंप जो एक आपदा थी, जबकि कोई भी भूकंप एक तरह का खतरा है। और इसके अलावा भविष्य में घटने वाली घटना को खतरा कहते हैं और घट चुकी या घट रही घटना को आपदा कहते है। और यह घटना कई जगह पर घट चुकी है जैसे कि माउन्ट टिम्पानोगोस, यूटा, एस्पेन ग्रोव ट्रेल के पृष्ठभाग (पूर्व) में आया हिमस्खलन के बारे में बताया गया है जो कि कई हिमस्खलनों में शामिल हैं। विशेष जानकारी के मुताबिक हाल ही के दिनों के कुछ सबसे महत्वपूर्ण भूकम्पों में शामिल हैं। हिंद महासागर में आया भूकंप जो कि घटित हुई थी 2004 में और इस भूकंप को इतिहास में बताया गया भूकंपों मे से दूसरे नंबर का सबसे बड़ा भूकंप।और इस भूकंप की वजह से आई भीषण सुनामी मे लाखों लोगों की जान गई। सुमात्रा का एक पूरा गांव ही खत्म हो गया।
इसी तरह 2005 में कश्मीर मे भी एक भूकंप आई थी जिसमें कई लोगों की जानें गयी।और
इसी तरह 2006 में जुलाई के महीने में एक जावा नामक भूकंप आया जिसकी वजह से सुनामी आई थी और यह सुनामी की लहरें काफी खतरनाक रूप ले चुकी थी इसमें भी कई लोगों की जानें गई।
सिचुआन भूकंप आइ थी वर्ष 2008 मे 12 मई को जो कि चीन के सिचुआन प्रांत में आया था और उसी वर्ष 27 मई को उस भूकंप में मरने वालों की संख्या तकरीबन 61150 तक हो गई। वर्ष 2008 मे 29 जुलाई को चिनो हिल्स भूकंप जिसका परिमाण 5.4 था, चिनो हिल्स, यह कैलिफोर्निया में आया था।
सन 1985 मे आपदा की घटना घटी। टाँगिवाई आपदा लहर का एक विशेष उदाहरण है, ऐसा ही एक था जिसने अर्मेरो, कोलंबिया में लगभग 23 हजार लोगों को नेवादो डेल रुइज़ के विस्फोट के दौरान मौत के घाट उतार दिया था। यह घटना भी स्मरण योग्य थी।
ज्वालामुखी के फटने या पत्थरों के गिरने से होने वाला ईरप्शन जो कि एक बहुत बड़ा आपदा हो सकते हैं, लेकिन इनके कई सारे प्रभाव होते हैं जो कि ईरप्शन के बाद हो सकते हैं वो भी मानव जीवन के लिए हानिकारक हैं।
लावा जिसके अन्दर बहुत ही गरम पत्थरों का समावेश होता है, यह किसी ज्वालामुखी के ईरप्शन के समय पैदा होता है। इसमे कई अलग प्रकार हैं, जो की या तो भुरभुरे या चिपचिप हो सकते हैं। ज्वालामुखी से निकलने के बाद ये रास्ते में आने वाले भवनों और पौधों को नष्ट कर देता है।
ज्वालामुखीय राख जिसका अर्थ है ठंडी राख यह आस पास के वातावरण में एक घना कोहरा बना कर बस सकती है। जल के साथ मिलकर यह एक ठोस पदार्थ में बदल जाती है । और ज्यादा मात्रा में इकठ्ठा होने पर इसके वजन से छतें ढह सकती हैं, लेकिन कम मात्रा में भी यदि साँस के साथ अन्दर लिया जाए तो ये बीमारी पैदा कर सकती है। ये चलते पुर्जों जैसे की इंजन में घर्षण से होने वाले नुकसान पैदा कर सकती है। क्योंकि इसके राख में ग्राउंड ग्लास जैसी प्रमुख विशेषताएं होती है।
विशालकाय ज्वालामुखी टोबा तबाही के सिद्धांत के अनुसार 70 से 75 हजार वर्ष पहले टोबा झील में एक विशालकाय ज्वालामुखीय घटना घटित हुई थी जिसने मानव जनसँख्या को घटा कर दस हजार से एक हजार प्रजनन लायक जोडों तक ही सीमित कर दिया था, इसकी वजह से मानव विकास में अड़चन पैदा हो गई थी। विशालकाय ज्वालामुखी से उसके द्वारा पैदा होने वाले राख के विशाल रूप में बदल गया होता है, जो वर्षों तक जलवायु और तापमान पर विनाशकारी वैश्विक असर डालते हैं।
पाय्रोक्लास्टिक प्रवाह यह गर्म ज्वालामुखीय के राख से बने होते हैं जो ज्वालामुखी के ऊपर होती रहती है, जब तक कि यह खुद के भार के वजह से नीचे नहीं गिर जाते उसके बाद ये बहुत तेज़ी से पर्वत से नीचे आती है और अपने रास्ते में आने वाली हर एक वस्तु को जला देती है। ऐसा यह भी कहा गया है कि पोम्पी का विनाश हो गया था जिसका कारण था पाय्रोक्लास्टिक प्रवाह के लहर जिसके बारे में बताया जा चुका है जो कि ज्वालामुखी के ईरप्शन के कारण पैदा होती हैं

वर्ष 2000 के वक्त मोजांबिक बाढ़ मे लिम्पोपो नदी जो की स्थित है दक्षिण मोज़ाम्बिक में है। और यह ऐसा बाढ़ है जिसके बारे में सबसे ज्यादा वर्णन किया गया है यह देश के अधिकांश हिस्से को तीन हफ्ते तक ढक के रक्खा था, जिसकी वजह से हजारों मौतें हुईं और वर्षों के लिए देश तबाह हो गया।
और इसके साथ ही यदि हम दूसरे बाढ़ के बारे में बताए तो सन 1931 में एक भीषण बाढ़ आई थी जिसके कारण कई करोड़ों लोगों की जान गई और इसके अलावा चीन की ह्वांग ही (पीली नदी) में अक्सर बाढ़ आती है। अगर हम आर्थिक दृष्टि से कहे तो सन 1993 में अब तक की सबसे महंगी और भीषण बाढ़ जिससे काफी लोगों को नुकसान हो चुका था बहुत सी ऐसे वस्तुओं, जानवरों, और इंसान की जान भी गई है इस बाढ़ के कारण जो कि अमेरिका के इतिहास में दर्ज की गई है।
वर्ष 1998 मे यांग जो की नदी की बाढ़ ये भी चीन में ही है। इसने एक सौ चाल्लीस लाख लोगों को बेघर कर दिया था और कई लोगों की जान भी गई इस बाढ़ में।
ट्रोपिकल चक्रवात यह चक्रवात सबसे अधिक बाढ़ और तूफान लाता है उदाहरण के तौर पर जैसे कि भोला चक्रवात है जो कि इससे पहले पाकिस्तान से टकराया था (जो की आज का बांग्लादेश है)
सन 1975 में नीना तूफान जो कि चीन से टकराया था।वर्ष 2001 में ट्रॉपिकल आंधी एलिसन जो हूस्टन, टैक्सस से टकराई थी।वर्ष 2005 में कैटरिना नाम का तूफ़ान, जिसने न्यू ओरलेंस के सबसे अधिक भाग को पानी में डुबो दिया था।
और यदि हम ईरप्शन के कारण होने वाले जोखिम के बारे मे कहे तो
न्योस झील के लिम्निक ईरप्शन से निकलने वाली गैसों से एक गाय की मृत्यु दम घुटने की वजह से हुई। जब अचानक ही एक गहरे पानी की झील से कार्बन डाइआक्साइड गैस निकलने लगती है तब लिम्निक ईरप्शन पैदा होता है, इससे वन्य के जीव जंतुओं, पशुओं और मनुष्यों के जीवन में जोखिम और दम घुटने का खतरा बढ़ जाता है जिसके कारण उनकी मौत होने की संभावना भी होती है। और इसी प्रकार का रिसाव से झील में सूनामी भी आ सकती है जो कि उठती हुई कार्बन डाइऑक्साइड की गैस के जल को विस्थापित करती है। कई महान विशेषज्ञों के अनुसार यह माना गया है कि भूस्खलन ज्वालामुखी के गतिविधि या विस्फोट होने का मुख्य विषय एक रिसाव का कारण हो सकते हैं। और अभी तक में सिर्फ दो लिम्निक रिसाव देखे और दर्ज किए गए हैं।
और वर्ष 1984 में कैमरून के मोनोउन झील के लिम्निक रिसाव में कई जोखिम को उठाना पड़ा जिसकी वजह से आसपास के ३७ लोग मरे गए थे इस रिसाव में। और इसके अलावा वर्ष 1986 मे न्योस झील में एक काफी बड़े रिसाव से भारी नुकसान हुई जिसमें करीब (सतरह सौ से अट्ठारह सौ) के बीच लोग की साँस रुकने से उनकी मौत हो गई।