शांति वार्ता के लिए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी तथा चीन के राष्ट्रपति जिन पिंग की मुलाकात।
करीब 5 महीने से चल रही सैन्य तनाव को दूर करने के लिए भारत तथा चीन के सैन्य कमांडरों के बीच बीते सितंबर में हुई छठे दौर की वार्ता में चीन ने फिर से अपना अडियल रुख दिखाया। जिसके परिणाम स्वरूप इस बैठक का भी कोई ठोस निर्णय नहीं निकल पाया और अब तो यही लगता है कि पूर्वी लद्दाख की बर्फीली चट्टानों पर दोनों देशों की सैन्य तैनाती अगले कुछ बर्फीले महीनों तक या इससे भी आगे बनी रहेगी, भारत और चीन के सैनीक आपस में भिड़े नहीं, इसकी भी चिंता दोनों सरकारों को है ,संभवत: इसी उद्देश्य से दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बिच हुई बैठक में पहली बार साझा बयान जारी किया गया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यह युद्ध कब तक चलेगा सीधी खुली लड़ाई से बचने के लिए दोनों देशों में से एक पक्ष को तो झुकना ही पड़ेगा। दोनों पक्षों के कड़े रुख को देखते हुए राजनयिक पर्यवेक्षकों की निगाह अब नवंबर के शुरू में रूस में होने वाली शंघाई सहयोग संगठन (एस सी ओ)की शिखर बैठक पर होगी जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने सामने हो सकते हैं ,जैसे रक्षा और विदेश मंत्रियों की बैठक ,यही आयोजन में शारीरिक मौजूदगी में हुई ,उसी तरह यदि शिखर बैठक भी इन नेताओं की शारीरिक मौजूदगी में होती है तो रूस में नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात हो सकती है ,सवाल यह उठता है कि चीन के जिस नेता की अवसरवादी समर नीति के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पूर्वी लद्दाख से लेकर दक्षिण चीन सागर ताइवान और हांगकांग के अलावा दक्षिण एशिया और अफ्रीका तक पांव पसारने की रणनीति को अमल में लाने जा रहा है वह अपने कदम पीछे हटा कर भारत के समक्ष झुकने का संदेश दुनिया को कैसे दे सकता है, चीन कहता है कि तनाव दूर करने का पूरा दारोमदार भारत पर है और वह तनाव दूर करने के लिए बीच का रास्ता अपनाएं ,जबकि भारत कहता है चीन पूर्वी लद्दाख की सीमाओं पर 5 मई से पहले की यथास्थिति बहाल करें, भारत और चीन की शिखर मुलाकाते ही अब तक रिश्तो की दशा तय करेगी और इन्हीं वार्ताओं पर निर्भर करेगा कि दोनों देशों के बीच सीमांत इलाकों में सैन्य तनातनी क्या आकार लेती है। अंतिम उम्मीद राजनीतिक गुफ्तगू पर ही टिकी हुई है अन्यथा मसले को सुलझाने के लिए युद्ध ही एकमात्र विकल्प बचता है ,इसी इरादे से आला राजनीतिक बैठकों के पहले दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के सातवें दौर की बैठक और इसके पहले दोनों देशों के विदेश मंत्रालय की राजनयिकों की अध्यक्षता वाली वर्किंग मेकैनिज्म फॉर कंसलटेंशन एंड कोऑर्डिनेशन यानी (डब्ल्यू एम सी सी )की बैठकों का दौर चलाने का फैसला किया गया है।

रूस की राजधानी मास्को में सितंबर को भारत और चीन के रक्षा मंत्रियों और फिर सितंबर को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकातों का कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया इन दोनों उच्च स्तरीय वार्ताओं की पृष्ठभूमि में बीते सितंबर को भारत और चीन के सैन्य कमांडरों की छठी दौर की बैठक के बारे में यह कहा जाए कि दोनों देशों ने युद्ध डालने पर सहमति का साझा बयान जारी किया तो गलत नहीं होगा छठे दौर की वार्ता में जमीनी स्थिति नहीं बदलने और नई सैनिक तैनाती नहीं करने पर सहमति का यही मतलब है कि चीन सेना जिन इलाकों मैं जहां तक आगे बढ़ चुकी है उसी को वह नहीं वास्तविक नियंत्रण रेखा बनाने पर तुली है जहां से शांतिपूर्वक उसे पीछे नहीं हटाया जा सकता दोनों देश नहीं चाहते हैं कि किसी तरह की सैन्य झड़प या खुला युद्ध हो इसलिए दोनों की कोशिश यही है कि वहां अपनी सैन्य ताकत दिखा कर एक दूसरे को झुकाने या पीछे हटाने को मजबूर किया जाए इसके साथ ही दोनों यह संदेश भी देना चाहते हैं कि वह युद्ध के लिए तैयार हैं इसलिए दोनों पक्ष एक दूसरे का मनोबल गिराने के लिए शक्ति प्रदर्शन के जरिए मनोवैज्ञानिक दबाव एक दूसरे पर डाल रहे हैं। चिनी दैनिक ग्लोबल टाइम्स कह रहा है कि लद्दाख की लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर शून्य से 40 डिग्री नीचे तापमान में भारतीय सैनिक गल कर वहां दफन हो जाएंगे जबकि भारतीय सैन्य अधिकारी कहने लगे हैं कि अपने सियाचिन अनुभव का फायदा उठाते हुए हमारे सैनिक पूर्वी लद्दाख के सीमांत बर्फीले इलाके में चीनी सैनिकों के पसीने छुड़ा देंगे क्योंकि चीनी सेना का इतने ठंडे इलाके में लंबे वक्त तक के लिए तैनात रहने का कोई अनुभव नहीं है वैसे तो भारत में चीन के राजदूत और चीनी विदेश मंत्रालय के बयानों में 2000 सालों की दोस्ती हाथी और ड्रैगन का शाझा नेतृत्व और विवादों को झगड़े में नहीं बदलने जैसी बातों पर जोर दिया जाता है लेकिन चीन की कथनी और करनी में अब तक हम भारी फर्क देखते आ रहे हैं इसलिए इस बार भी साझा बयान में जो आपसी सहमति व्यक्त की गई है उसको इसी नजरिए से देखा जा सकता है कि पूर्वी लद्दाख के कई इलाकों में जिन चोटियों पर भारतीय सेना ने कब्जा किया उससे चीन की रणनीति स्थिति कमजोर हो गई है इसलिए उसने शाझा बयान में भारत से यह सहमति ली है कि अग्रिम मोर्चे पर अब और सैनिक तैनात नहीं की जाए। भारतीय सैनिक हलकों मैं यही बड़ी चिंता है कि पूर्वी लद्दाख की पर्वतीय चोटियां पैंगोंग झील, गलवान,गोगरा,हाट स्परिंग, और देपसांग, के मैदानी इलाके अभी सियाचिन ग्लेशियर जैसी सैन्य तैनाती की शक्ल लेने लगे हैं चीन अपनी इस मंशा को पूरा करने में कामयाब हो रहा है कि उसकी शर्तें नहीं मानने पर भारत को अपने इलाके की चौकसी के लिए विपरीत परिस्थितियों में करीब 50000 सैनिकों को तैनात करने का फैसला करना पड़ा है और इस पर होने वाले रोजाना करीब सौ से डेढ़ सौ करोड़ रुपए के खर्च का भारी बोझ ऐसे वक्त उठाना पड़ेगा जब भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना की माहामारी की चोट झेल रहा है।